शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

राजा शिवि की कहानी

शीनर पुत्र महाराजा शिवि बड़े ही दयालु और शरणागतवत्सल थे। एक बार राजा एक महान यज्ञ कर रहे थे। इतने में एक कबूतर आता है और राजा की गोद में छिप जाता है। पीछे से एक विशाल बाज वहाँ आता है और राजा से कहता है –

राजन् मैने तो सुना था आप बड़े ही धर्मनिष्ठ राजा हैं फिर आज धर्म विरुद्ध आचरण क्य़ो कर रहे हैं। यह कबूतर मेरा आहार है और आप मुझसे मेरा आहार छीन रहे हैं।

इतने में कबूतर राजा से कहता है –

महाराज मैं इस बाज से डरकर आप की शरण में आया हूँ। मेरे प्राणो की रक्षा कीजिए महाराज।

राजा धर्म संकट में पड़ जाते हैं। पर राजा अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करके कहते हैं –

राजा – तुमसे डर कर यह कबूतर प्राण रक्षा के लिए मेरी शरण में आया हैं। इसलिए शरण में आये हुए इस कबूतर का मैं त्याग नहीं कर सकता। क्य़ोकि जो लोग शरणागत की रक्षा नहीं करते उनका कहीं भी कल्य़ाण नहीं होता।

बाज – राजन् प्रत्येक प्राणी भूख से व्याकुल होते हैं। मैं भी इस समय भूख से व्याकुल हूँ। यदि मुझे इस समय य़ह कबूतर नहीं मिला तो मेरे प्राण चले जायेंगे। मेरे प्राण जाने पर मेरे बाल-बच्चो के भी प्राण चले जाय़ेंगे। हे राजन्! इस तरह एक जीव के प्राण बचाने की जगह कई जीव के प्राण चले जाय़ेंगे।

राजा – शरण में आये इस कबूतर को तो मैं तुम्हें नहीं दे सकता। किसी और तरह तुम्हारी भूख शान्त हो सकती हो तो बताओ। मैं अपना पूरा राज्य़ तुम्हें दे सकता हूँ, पूरे राज्य़ का आहार तुम्हें दे सकता हूँ, अपना सब कुछ तुम्हें दे सकता हूँ पर य़ह कबूतर तुम्हें नही दे सकता।

बाज – हे राजन् । यदि आपका इस कबूतर पर इतना ही प्रेम है, तो इस कबूतर के ठीक बराबर का तौलकर आप अपना मांस मुझे दे दीजिए मैं अधिक नही चाहता।

राजा – तुमने बड़ी कृपा की। तुम जितना चाहो उतना मांस मैं देने को तैयार हूँ। यदि यह शरीर प्राणियों के उपकार के काम न आये तो प्रतिदिन इसका पालन पोषण करना बेकार है। हे बाज मैं तुम्हारे कथनानुसार ही करता हूँ।

यह कहकर राजा ने एक तराजू मंगवाया और उसके एक पलडे में उस कबूतर को बैठाकर दूसरे में अपना मांस काट-काट कर रखने लगे और उस कबूतर के साथ तौलने लगे। कबूतर की रक्षा हो और बाज के भी प्राण बचें, दोनो का ही दुख निवारण हो इसलिए महाराज शिवि अपने हाथ से अपना मांस काट-काट के तराजू में रखने लगे।

तराजू में कबूतर का वजन मांस से बढता ही गया, राजा ने शरीर भर का मांस काट के रख दिया परन्तु ककबूतर का पलडा नीचे ही रहा। तब राजा स्वयं तराजू पर चढ गये।

जैसे ही राजा तराजू पर चढे वैसे ही कबूतर और बाज दोनो ही अन्तर्धान हो गये और उनकी जगह इन्द्र और अग्नि देवता प्रगट हुए।

इन्द्र ने कहा- राजन् तुम्हारा कल्याण हो। और यह जो कबूतर बना था यह अग्नि है। हम लोग तुम्हारी परीक्षा लेने आये थे। तुमने जैसा दुस्कर कार्य किया है, वैसा आज तक किसी ने नहीं किया। जो मनुष्य अपने प्राणो को त्याग कर भी दूसरे के प्राणो की रक्षा करता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है।

अपना पेट भरने के लिए तो पशु भी जीते हैं, पर प्रशंसा के योग्य जीवन तो उन लोगो का है जो दूसरों के लिए जीते हैं।

इन्द्र ने राजा को वरदान देते हुए कहा- तुम चिर काल तक दिव्य रूप धारण करके पृथ्वी का पालन कर अन्त में भगवान् के ब्रह्मलोक में जाओगे। इतना कहकर वे दोनो अन्तर्धान हो गये।

दोस्तों, भारत वह भूमि है जहाँ राजा शिवि और दधीचि जैसे लोग अवतरित हुए हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपना जिन्दा शरीर दान दे दिया। और एक हम लोग हैं जिन्दा की तो बात छोड़िए मरने के बाद भी अंग दान नहीं करतेदोस्तो मरने के बाद यह शरीर कूड़ा हो जाता है, उसमें से बदबू उठने लगती है, घर और परिवारी जन जल्द से जल्द उसे घर से बाहर ले जाते हैं। अगर वह शरीर काम का होता तो वह उसको जलाते या गाडते क्यों?

पर आपके लिए जो काम का नहीं है, वह किसी को जीवन दे सकता है। किसी को रोशनी दे सकता हैं। और मेडिकल साइंस को एक नई दिशा दे सकता है। और ऐसा तब हो सकता है जब आप इस मृत शरीर को दान करें। इसलिए दोस्तो अब समय आ गया है अंतेष्टि क्रिया को बदलने का और अंगदान कर परोपकार के भागीदार बनने का। कृपया इस बात पर विचार करें और अपना निर्णय लें।

कुछ पाना है तो बस इतना करो!

 

अयोध्या में अनेक ऐसे मठ और आश्रम हैं, जहां रहकर गरीब छात्र पढ़ते हैं। आश्रम के कार्यों में हाथ बटाते हैं। मधुसूदन बड़े परिश्रमी और मिलनसार थे। जल्दी ही सबसे घुल मिल गए।

आश्रम के प्रमुख एक स्वामी जी थे। संस्कृत के बड़े विद्वान। शिक्षा के अनुरागी। प्रेरक व्यक्तित्व।ओजस्वी वाणी। उम्र पचपन साल। लेकिन चुस्ती और उत्साह में युवाओं जैसे। विद्यार्थियों की शिक्षा उन्हें सबसे प्रिय थी।

मधुसूदन जल्दी ही स्वामी जी के प्रिय छात्र हो गए। दिन में खूब जमकर कॉलेज की पढ़ाई करते। शाम को स्वामी जी के साथ सरयू स्नान फिर हनुमानगढ़ी जाकर हनुमानजी का दर्शन करते! फिर पास में ही स्थित कनक भवन से प्रसाद लेकर वापस आश्रम आते! इस दौरान ज्ञान विज्ञान की बातें चलती रहतीं। हालांकि मधुसूदन की धर्म में कोई खास रुचि नहीं थी, लेकिन स्वामी जी का व्यक्तित्व और ज्ञान की बातों से वह प्रभावित थे।

स्वामी जी एक बात बराबर कहते-

“जेहिं के जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहु”

“मतलब?”

“ये रामचरित मानस की चौपाई है। इसके अनुसार अगर कोई सच्चे मन से किसी चीज़ को चाहे, तो वो उसे मिल जाती है”

“वो कैसे?”

“आकर्षण के सिद्धांत से”

“मैं समझा नहीं”

देखो। जब भी तुम सच्चे दिल से कुछ चाहते हो तो क्या होता है! तुम उसके विचारों में डूब जाते हो। रात-दिन, सुबह-शाम बस वही सोचते हो! विचारों के अनुसार ही तुम्हारे कर्म होने लगते हैं। जैसे ही विचार और कर्म एकरूप हो जाते हैं, व्यक्ति उस वस्तु या परिस्थिति के योग्य बन जाता है। योग्यता आ जाने के बाद वह चीज़ उसे मिलकर ही रहती है !

“इस सिद्धांत से लाभ उठाने का क्या कोई सरल तरीका भी है?”

“हां। ईश्वर के प्रति नियमित और सच्चे दिल से प्रार्थना करके हम आकर्षण के इस सिद्धांत को अपने जीवन में क्रियाशील कर सकते हैं””प्रार्थना करने से क्या होगा?”

“मन की बिखरी शक्ति एक लक्ष्य पर केंद्रित होगी। मानसिक ऊर्जा बढेग़ी। बढ़ी हुई मानसिक शक्ति से कर्मों में दृढ़ता आएगी।यह दृढ़ता लक्ष्य की ओर ले जाएगी”

“क्या सोचने से ही सब हो जाएगा?”

“नहीं। जबतक लक्ष्य प्राप्ति के लिए ईश्वर से सच्ची प्रार्थना नहीं होती, तबतक नहीं। यह ताला जानबूझकर प्रकृति के द्वारा लगाया गया है जिससे मानसिक शक्ति के द्वारा लोग अपनी गलत इच्छाओं को न पूरा कर सकें”

इस तरह के तर्क- वितर्क चलते ही रहते थे। मधुसूदन को यह सिद्धांत कोरी कल्पना लगता था। वहीं स्वामी जी का प्रबल विश्वास था कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमें ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। अगर वो इच्छा हितकारी है तो ईश्वर उसे पूरा करेंगे क्योंकि उनका भंडार अक्षय और अनंत है। जब भी आश्रम में कोई बीमार पड़ता, स्वामी जी सामूहिक प्रार्थना जरूर करवाते।

समय गुजरता गया। मधुसूदन जी की शिक्षा पूरी हो गयी। एक अच्छे सरकारी पद पर लखनऊ में नियुक्ति हो गयी। वह नई परिस्थितियों में रम गए।

बीस- बाइस साल पंख लगाकर उड़ गए। आश्रम से नाता पूरी तरह टूट चुका था। लेकिन दो दिनों से एक अनूठी बात हो रही थी! जब भी बिस्तर पर लेटते, स्वामी जी की याद आती!

उन्होंने आश्रम के एक ट्रस्टी का नंबर लिया। बात की। पता चला कि स्वामी जी को कानों से बहुत कम सुनाई देता है।

मधुसूदन के मन में इच्छा जगी। स्वामी जी को कान की मशीन (Hearing Aid) देनी चाहिए। उन्होंने अपने पड़ोस में ही रहने वाले एक विशेषज्ञ चिकित्सक से बात की। उनके बताए पते पर एक ऑडियोलॉजिस्ट से जाकर  मिले। कान की मशीन खरीद ली। उसे चलाने और फिट करने का तरीका समझ लिया।

रात को घर लौटकर उन्होंने एक फैसला किया। कल अयोध्या जाऊंगा।

अगले दिन खूब सवेरे उठे। सुबह आठ बजे वे आश्रम पहुंच चुके थे।उस समय विद्यार्थी सुबह का जलपान कर रहे थे।

एक छात्र से बातचीत शुरू हुई।

“बूढ़े स्वामीजी कैसे हैं?”

“ठीक हैं, लेकिन अब कानों से सुनाई नहीं देता”

“इलाज हुआ कि नहीं”

“डॉक्टर देखने आया था। कान की मशीन बोला है”

“मशीन तो लग गयी होगी अब?”

“कैसे लगेगी! अयोध्या या फैज़ाबाद में वैसी कान की इलेक्ट्रॉनिक मशीन मिली नहीं।लखनऊ में ही मिलती है”

“लखनऊ से मंगाया नहीं?”

“स्वामी जी कहते हैं, आश्रम का धन विद्यार्थियों के लिए है। अगर वास्तव में उन्हें इस मशीन की जरूरत होगी तो ईश्वर इसे खुद लखनऊ से भेज देंगे”

“अच्छा!!!!”

“हाँ। हम आश्रमवासी पिछले तीन दिनों से हर शाम को सामूहिक प्रार्थना कर रहें हैं कि ईश्वर स्वामी जी की समस्या का निदान करें”

मधुसूदन जी के पूरे शरीर में जैसे कंपन हो रहा था। वह उस विद्यार्थी के साथ स्वामी जी के कमरे में गए। वे बहुत वृद्ध हो चुके थे। स्मृति भी कम हो चुकी थी। मुश्किल से मधुसूदन को पहचान पाए। बगल की मेज पर ही डॉक्टर का पुर्जा पड़ा था।उसपर ठीक उसी पावर और ब्रांड की हियरिंग एड का नाम लिखा था जो वे लखनऊ से लेकर आये थे!

मधुसूदन जी अपने आंसू नहीं रोक सके। तो क्या वह ईश्वर से की गई प्रार्थना के उत्तर में अयोध्या आये थे! प्रार्थना की शक्ति कितनी असीम होती है, उन्हें आज इसका अहसास हो रहा था!

उनके मन में अप्रत्याशित तौर से हियरिंग एड देने की इच्छा जगी! उन्हें एक विशिष्ट ब्रांड और पावर का महंगा हियरिंग एड ही पसंद आया! वे अयोध्या आये! ये सबकुछ उस प्रार्थना की शक्ति से हुआ, जो हर मनुष्य के हृदय में विद्यमान है! आज उन्हें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गया।

मधुसूदन ने स्वामी जी के कान में मशीन लगाई। अच्छी तरह सब कुछ सेट किया। साथ वाले विद्यार्थी को भी समझा दिया। अब स्वामी जी आराम से सुन सकते थे।

थोड़ी देर वार्तालाप के बाद चलने की आज्ञा मांगी। स्वामीजी ने उन्हें हनुमानगढ़ी के प्रसिद्ध लड्डुओं का प्रसाद पूरे परिवार के लिए दिया। स्वामीजी को प्रणाम करके जब वे आश्रम से चले तो उनका हृदय अब पूरी तरह शांत था।

 

 

 

 

पेड़ का इनकार!

 

एक बड़ी सी नदी के किनारे कुछ पेड़ थे जिसकी टहनियां नदी के धारा के ऊपर तक भी फैली हुई थीं।

एक दिन एक चिड़ियों का परिवार अपने लिए घोसले की तलाश में भटकते हुए उस नदी के किनारे पहुंच गया।

चिड़ियों ने एक अच्छा सा पेड़ देखा और उससे पूछा, “हम सब काफी समय से अपने लिए एक नया मजबूत घर बनाने के लिए वृक्ष तलाश रहे हैं, आपको देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई, आपकी मजबूत शाखाओं पर हम एक अच्छा सा घोंसला बनाना चाहते हैं ताकि बरसात शुरू होने से पहले हम खुद को सुरक्षित रख सकें। क्या आप हमें इसकी अनुमति देंगे?”

पेड़ ने उनकी बातों को सुनकर साफ इनकार कर दिया और बोला-

मैं तुम्हे इसकी अनुमति नहीं दे सकता…जाओ कहीं और अपनी तलाश पूरी करो।

चिड़ियों को पेड़ का इनकार बहुत बुरा लगा, वे उसे भला-बुरा कह कर सामने ही एक दूसरे पेड़ के पास चली गयीं।

उस पेड़ से भी उन्होंने घोंसला बनाने की अनुमति मांगी।

इस बार पेड़ आसानी से तैयार हो गया और उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी वहां रहने की अनुमति दे दी।

चिड़ियों ने उस पेड़ की खूब प्रशंसा की और अपना घोंसला बना कर वहां रहने लगीं।

समय बीता… बरसात का मौसम शुरू हो गया। इस बार की बारिश भयानक थी…नदियों में बाढ़ आ गयी…नदी अपने तेज प्रवाह से मिटटी काटते-काटते और चौड़ी हो गयी…और एक दिन तो ईतनी बारिश हुई कि नदी में बाढ़ सा आ गयी तमाम पेड़-पौधे अपनी जड़ों से उखड़ कर नदी में बहने लगे।

और इन पेड़ों में वह पहला वाला पेड़ भी शामिल था जिसने उस चिड़ियों को अपनी शाखा पर घोंसला बनाने की अनुमति नही दी थी।

उसे जड़ों सहित उखड़कर नदी में बहता देख चिड़ियों कर परिवार खुश हो गया, मानो कुदरत ने पेड़ से उनका बदला ले लिया हो।

चिड़ियों ने पेड़ की तरफ उपेक्षा भरी नज़रों से देखा और कहा, “एक समय जब हम तुम्हारे पास अपने लिए मदद मांगने आये थे तो तुमने  साफ इनकार कर दिया था, अब देखो तुम्हारे इसी स्वभाव के कारण तुम्हारी यह दशा हो गई है।”

इसपर इस पेड़ ने मुस्कुराते हुए उन चिड़िया से कहा-

मैं जानता था कि मेरी उम्र हो चली है और इस बरसात के मौसम में मेरी कमजोर पड़ चुकी जडें टिक नहीं पाएंगी… और मात्र यही कारण था कि मैंने तुम्हें इनकार कर दिया था क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारे ऊपर विपत्ति आये।

फिर भी तुम्हारा दिल दुखाने के लिए मुझे क्षमा करना… और ऐसा कहते-कहते पेड़ पानी में बह गया।  

चिड़ियाँ अब अपने व्यवहार पर पछताने के अलावा कुछ नही कर सकती थीं।

दोस्तों, अक्सर हम दूसरों के रूखे व्यवहार या ‘ना’ का बुरा मान जाते हैं, लेकिन कई बार इसी तरह के व्यवहार में हमारा हित छुपा होता है। खासतौर पे जब बड़े-बुजुर्ग या माता-पिता बच्चों की कोई बात नहीं मानते तो बच्चे उन्हें अपना दुश्मन समझ बैठते हैं जबकि सच्चाई ये होती है कि वे हमेशा अपने बच्चों की भलाई के बारे में ही सोचते हैं।

इसलिए, यदि आपको भी कहीं से कोई ‘इनकार’ मिले तो उसका बुरा ना माने क्या पता उन चिड़ियों की तरह एक ‘ना’ आपके जीवन से भी विपत्तियों को दूर कर दे!

 

 

रविवार, 28 नवंबर 2021

क्या है HANDSOME होने का सही मतलब?

 दूरदराज के एक गाँव में एक किसान रहता था. उसने सुना था कि उसके देश के प्रेसिडेंट बड़े महान इंसान हैं. उसने मन ही मन उनकी एक तस्वीर बना रखी थी… एक लम्बा, खूबसूरत इंसान, राजसी ठाट-बाट वाला, जो चले तो लोग देखते रह जाएं, जो बोले तो लोग सुनते रह जाएं.

उसके मन में प्रेसिडेंट को देखने की तीव्र इच्छा थी, पर बेचारा ऐसी जगह रहता था जहाँ अभी तक बिजली भी नहीं पहुँच पायी थी… उसने कभी टीवी या अखबार में भी प्रेसिडेंट को नहीं देखा था.

लेकिन यदि मन किसी चीज को पूरी ताकत से चाह ले तो वो चीज होना तय है. एक दिन पता चला कि उसके गाँव से करीब 100 मील दूर खुद प्रेसिडेंट आने वाले हैं. उसने फ़ौरन वहां जाने का निश्चय कर लिया… काफी दूर पैदल चलने और कई साधनों को बदलने के बाद आखिरकार वह तय दिन और समय पर प्रेसिडेंट को देखने के लिए पहुँच गया.

भीड़ बहुत थी. हज़ारों लोग अपने प्रिय प्रेसिडेंट की एक झलक पाने के लिए खड़े थे. किसान ने बगल में खड़े एक व्यक्ति से पूछा-

“क्या आपने कभी प्रेसिडेंट को देखा है?”

“हाँ देखा है.” जवाब आया.

“वो दिखने में कैसे हैं?”

“कुछ ख़ास नहीं, बड़े साधारण से हैं.”

वे बात कर ही रहे थे कि जनता का शोर उनके कानो में पड़ा….प्रेसिडेंट उनके बीच से होते हुए स्टेज पर जा रहे थे.

किसान ने देखा कि एक सामन्य कद का साधारण सा इंसान रेड कारपेट पे चलता हुआ आगे बढ़ रहा है. प्रेसिडेंट उसकी मानसिक तस्वीर से बिलकुल अलग थे.

किसान अपने विचारों में खोया हुआ था कि तभी प्रेसिडेंट उसके सामने रुके उससे हाथ मिलाया, हाल-चाल लिया और आगे बढ़ गए. उसे यकीन नहीं हुआ कि देश का राष्ट्रपति उससे दो शब्द बोल कर गया है…उसने फ़ौरन सोचा–

कौन कहता है मेरा राष्ट्रपति साधारण है…मैंने तो आज तक इससे असाधारण व्यक्ति नहीं देखा!

दोस्तों, वो शख्श कोई और नहीं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम थे. इंसान अपने बाहरी रंग-रूप से महान या असाधारण नहीं होता, वो अपने अंदर की अच्छाई, काबिलियत , करुणा और प्रेम से असाधारण बनता है.

डॉ. कलाम ने एक बार भाषण देते हुए कहा भी था-

I am not handsome, but I can give my Hand To Some.

यानी मैं हैण्डसम नहीं हूँ लेकिन मैं कसी को अपना हाथ मदद के लिए दे सकता हूँ.

सोमवार, 22 नवंबर 2021

बाज का शिकार

 बाज के बच्चे ने अभी-अभी उड़ना सीखा था… उत्साह से भरा होने के कारण वह हर किसी को अपनी कलाबाजियां दिखाने में लगा था.

तभी उसने पेड़ के नीचे एक सूअर के बच्चे को भागते देखा, ” माँ वो देखो सूअर, कितना स्वादिष्ट होगा ना, मैं अभी उसका शिकार करता हूँ.”

“नहीं बेटा,” माँ बोलीं, “अभी तुम इसके लिए तैयार नहीं हो, सूअर एक बड़ा शिकार है , तुम चूहे से शुरुआत करो.”

 बाज आज्ञाकारी था, उसने फ़ौरन माँ की बात मान ली और जल्दी ही उसने बड़ी कुशलता के साथ चूहों का शिकार करना सीख लिया.

अब उसका आत्मविश्वास बहुत बढ़ चुका था, वह अपनी माँ के पास गया और फिर से सूअर का शिकार करने के लिए कहने लगा.

“अभी नहीं बेटा, पहले तुम खरगोश का शिकार करना सीखो”, माँ ने समझाया.

कुछ ही दिनों में बाज ने खरगोशों का शिकार करना भी सीख लिया. उसे पूरा यकीन था कि अब वो अपने पहले लक्ष्य सूअर को ज़रूर मार सकता है…और इसी की आज्ञा लेने वह माँ के पास पहुंचा.

पर इस बार भी माँ ने उसे मना कर दिया और पहले मेमने का शिकार करने को कहा. बाज जल्दी ही मेमनों का शिकार करने में पारंगत हो गया.

फिर एक दिन वह अपनी माँ के साथ यूँही डाल पर बैठा था कि एक सूअर का बच्चा उधर से गुजरा… बाज ने अपनी माँ की ओर देखा…माँ मुस्कुराई और सूअर पर झपट पड़ने का इशारा किया.

 बाज ने फ़ौरन नीचे की ओर उड़ान भरी और उस दिन उसने पहली बार अपना मनपसंद खाना खाया.

दोस्तों, सोचिये अगर माँ ने पहली बार में ही उसे सूअर का शिकार करने को कह दिया होता तो क्या होता?

नन्हा बाज निश्चित तौर पर असफल हो जाता…और संभव है उसका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता. लेकिन जब उसने पहले छोटे-छोटे शिकार किये तो उसका आत्मविश्वास और उसकी काबिलियत दोनों निखरती गयीं. और अंततः वह अपने मनपसन्द लक्ष्य को पाने में सफल हुआ.

बाज की ये कहानी हमें अपने बड़े लक्ष्य को छोटे-छोटे आसान हिस्सों में बाँट कर उसे पाने की सीख देती है. इसलिए बड़ा लक्ष्य बनाइये, ज़रूर बनाइये लेकिन उसे पाने के लिए अपने अन्दर धैर्य रखिये, अपने गुरु की बात मानिए और योजनाबद्ध तरीके से उसे छोटे हिस्सों में बांटकर अंततः अपने उस बड़े लक्ष्य को हासिल करिए.

 

 

 

सोमवार, 15 नवंबर 2021

आम की गुठलियाँ

 

अरविन्द के अन्दर धैर्य बिलकुल भी नहीं था. वह एक काम शुरू करता…कुछ दिन उसे करता और फिर उसे बंद कर दूसरा काम शुरू कर देता. इसी तरह कई साल बीत चुके थे और वह अभी तक किसी बिजनेस में सेटल नहीं हो पाया था. 

अरविन्द की इस आदत से उसके माता-पिता बहुत परेशान थे. वे जब भी उससे कोई काम छोड़ने की वजह पूछते तो वह कोई न कोई कारण बता खुद को सही साबित करने की कोशिश करता. 

अब अरविन्द के सुधरने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी कि तभी पता चला कि शहर से कुछ दूर एक आश्रम में  बहुत पहुंचे हुए गुरु जी का आगमन हुआ. दूर-दूर से लोग उनका प्रवचन सुनने आने लगे. 

एक दिन अरविन्द के माता-पिता भी उसे लेकर महात्मा जी के पास पहुंचे.

उनकी समस्या सुनने के बाद उन्होंने अगले दिन सुबह-सुबह अरविन्द को अपने पास बुलाया. 

अरविन्द को ना चाहते हुए भी भोर में ही गुरु जी के पास जाना पड़ा. 

गुरु जी उसे एक  बागीचे में ले गए और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए बोले. 

बेटा तुम्हारा पसंदीदा फल कौन सा है.

“आम” अरविन्द बोला.

ठीक है बेटा !  जरा वहां रखे बोरे में से कुछ आम की गुठलियाँ निकालना और उन्हें यहाँ जमीन में गाड़ देना.  

अरविन्द को ये सब बहुत अजीब लग रहा था लेकिन गुरु जी बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा भी नहीं था. 

उसने जल्दी से कुछ गुठलियाँ उठायीं और फावड़े से जमीन खोद उसमे गाड़ दीं.

फिर वे अरविन्द को लेकर वापस आश्रम में चले गए. 

करीब आधे घंटे बाद वे अरविन्द से बोले, “जरा बाहर जा कर देखना उन  गुठलियों में से फल निकला की नहीं!”

“अरे! इतनी जल्दी फल कहाँ से निकल आएगा… अभी कुछ ही देर पहले तो हमने गुठलियाँ जमीन में गाड़ी थीं.”

“अच्छा, तो रुक जाओ थोड़ी देर बाद जा कर देख लेना!”

कुछ देर बाद उन्होंने अरविन्द से फिर बाहर जा कर देखने को कहा.

अरविन्द जानता था कि अभी कुछ भी नहीं हुआ होगा, पर फिर भी गुरु जी के कहने पर वह बागीचे में गया.

लौट कर बोला, “कुछ भी तो नहीं हुआ है गुरूजी…आप फल की बात कर रहे हैं अभी तो बीज से पौधा भी नहीं निकला है.”

“लगता है कुछ गड़बड़ है!”, गुरु जी ने आश्चर्य से कहा.

“अच्छा, बेटा ऐसा करो, उन गुठलियों को वहां से निकाल के कहीं और गाड़ दो…”

अरविन्द को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन वह दांत पीस कर रह गया.

कुछ देर बाद गुरु जी फिर बोले, “अरविन्द बेटा, जरा बाहर जाकर देखो…इस बार ज़रूर फल निकल गए होंगे.”

अरविन्द इस बार भी वही जवाब लेकर लौटा और बोला, “मुझे पता था इस बार भी कुछ नहीं होगा…. कुछ फल-वाल नहीं निकला…”

“….क्या अब मैं अपने घर जा सकता हूँ?”

“नहीं, नहीं रुको…चलो हम इस बार गुठलियों को ही बदल कर देखते हैं…क्या पता फल निकल आएं.”

इस बार अरविन्द ने अपना धैर्य खो दिया और बोला, “मुझे यकीन नहीं होता कि आपके जैसे नामी गुरु को इतनी छोटी सी बात पता नहीं कि कोई भी बीज लगाने के बाद उससे फल निकलने में समय लगता है….आपको  बीज को खाद-पानी देना पड़ता है ….लम्बा इन्तजार करना पड़ता है…तब कहीं जाकर फल प्राप्त होता है.”

गुरु जी मुस्कुराए और बोले-

बेटा, यही तो मैं तुम्हे समझाना चाहता था…तुम कोई काम शुरू करते हो…कुछ दिन मेहनत करते हो …फिर सोचते हो प्रॉफिट क्यों नहीं आ रहा!  इसके बाद तुम किसी और जगह वही या कोई नया काम शुरू करते हो…इस बार भी तुम्हे रिजल्ट नहीं मिलता…फिर तुम सोचते हो कि “यार! ये धंधा ही बेकार है!

एक बात समझ लो जैसे आम की गुठलियाँ तुरंत फल नहीं दे सकतीं, वैसे ही कोई भी कार्य तब तक अपेक्षित फल नहीं दे सकता जब तक तुम उसे पर्याप्त प्रयत्न और समय नहीं देते.  

इसलिए इस बार अधीर हो आकर कोई काम बंद करने से पहले आम की इन गुठलियों के बारे में सोच लेना …. कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने उसे पर्याप्त समय ही नहीं दिया!

अरविन्द अब अपनी गलती समझ चुका था. उसने मेहनत और धैर्य के बल पर जल्द ही एक नया व्यवसाय खड़ा किया और एक कामयाब व्यक्ति बना.

 

 

 

शनिवार, 13 नवंबर 2021

मूर्तिकार और पत्थर

 

एक बार एक मूर्तिकार एक पत्थर को छेनी और हथौड़ी से काट कर  मूर्ति का रूप दे रहा था. जब पत्थर  काटा जा रहा था, तो उसको बहुत दर्द हो रहा था.

कुछ देर तो पत्थर ने बर्दाश्त किया पर जल्द ही उसका धैर्य जवाब दे गया.

वह नाराज़ होते हुए बोला, ” बस ! अब और नहीं सहा जाता. छोड़ दो मुझे मैं तुम्हारे वार को अब और नहीं सह सकता… चले जाओ यहाँ से!”

मूर्तिकार ने समझाया, “अधीर मत हो! मैं तुम्हे भगवान् की मूरत के रूप में तराश रहा हूँ.  अगर तुम कुछ दिनों का दर्द बर्दाश्त कर लोगे तो जीवन भर लोग तुम्हे पूजेंगे… दूर-दूर से लोग तुम्हारे दर्शन करने आयेंगे. दिन-रात पुजारी तुम्हारी देख-भाल में लगे रहेंगे.”

और ऐसा कह कर उसने अपने औजार उठाये ही थे कि पत्थर क्रोधित होते हुए बोला, “मुझे मेरी ज़िन्दगी खुद जीने दो… मैं जानता हूँ मेरे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा… मैं आराम से यहाँ पड़ा हूँ…चले जाओ मैं अब जरा सी भी तकलीफ नहीं सह सकता!”

मैं जानता हूँ तुम्हे दर्द बहुत हो रहा है…पर अगर आज तुम अपना आराम देखोगे तो कल को पछताओगे… मैं तुम्हारे गुणों को देख सकता हूँ तुम्हारे अन्दर आपार संभावनाएं हैं… यूँ यहाँ पड़े-पड़े अपना जीवन बर्बाद मत करो! मूर्तिकार ने समझाया.

पर पत्थर पर उसकी बात का कोई असर नहीं हुआ, वह अपनी बात पर ही अड़ा रहा.

मूर्तिकार पत्थर को वहीँ  छोड़ आगे बढ़ गया.

सामने ही उसे एक दूसरा अच्छा पत्थर दिख गया. उसने उसे उठाया और उसकी मूर्ति बना दी.

दूसरे पत्थर ने दर्द बर्दाश्त कर लिया और वो भागवान की मूर्ति बन गया, लोग रोज उसे  फूल-माला चढाने लगे, दूर-दूर से लोग उसके दर्शन करने आने लगे.

फिर एक दिन एक और पत्थर उस मंदिर में लाया गया और उसे एक कोने में रख दिया गया. उसे नारियल फोड़ने के लिए इस्तमाल किया जाने लगा.  वह कोई और नहीं बल्कि वही पत्थर था जिसने मूर्तिकार को उसे छूने से मना कर दिया था.

अब वह मन ही मन पछता रहा था कि काश उसने उसी वक्त दर्द सह लिया होता तो आज समाज में उसकी भी पूछ होती… सम्मान होता… कुछ दिनों की वह पीड़ा इस जीवन भर के कष्ट से बचा लेती!

दोस्तों, हमारे लिए निर्णय लेने का ये सही समय है कि हम आज दर्द बर्दाश्त करना है या अभी मौज-मस्ती करनी है और फिर जीवन भर का दर्द झेलना है.  आज आप जिस किसी competitive exam की तैयारी कर रहे हों… जो भी skill acquire करने की कोशिश कर रहे हों…जिस किसी खेल में excel करने का प्रयास कर रहे हों…उसमे अपना 100% effort लगाइए… होने दीजिये अपने ऊपर तकलीफों के वार…हार मत मानिए… उस दूसरे पत्थर की तरह अभी सह लीजिये और अपने लक्ष्य को प्राप्त करिए ताकि पहले पत्थर की तरह आपको जीवन भर कष्ट ना सहना पड़े.