सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

लालच का फल

किसी गांव में एक गड़रिया रहता था। वह लालची स्वभाव का था, हमेशा यही सोचा करता था कि किस प्रकार वह गांव में सबसे अमीर हो जाये। उसके पास कुछ बकरियां और उनके बच्चे थे। जो उसकी जीविका के साधन थे।

एक बार वह गांव से दूर जंगल के पास पहाड़ी पर अपनी बकरियों को चराने ले गया। अच्छी घास ढूँढने के चक्कर में आज वो एक नए रास्ते पर निकल पड़ा। अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि तभी अचानक तेज बारिश होने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। तूफान से बचने के लिए गड़रिया कोई सुरक्षित स्थान ढूँढने लगा। उसे कुछ ऊँचाई पर एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया बकरियों को वहीँ बाँध उस जगह का जायजा लेने पहुंचा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। वहां बहुत सारी जंगली भेड़ें मौजूद थीं।

मोटी- तगड़ी भेड़ों को देखकर गड़रिये को लालच आ गया। उसने सोचा कि अगर ये भेड़ें मेरी हो जाएं तो मैं गांव में सबसे अमीर हो जाऊंगा। इतनी अच्छी और इतनी ज्यादा भेड़ें तो आस-पास के कई गाँवों में किसी के पास नहीं हैं।

उसने मन ही मन सोचा कि मौका अच्छा है मैं कुछ ही देर में इन्हें बहला-फुसलाकर अपना बना लूंगा। फिर इन्हें साथ लेकर गांव चला जाऊंगा।

यही सोचते हुए वह वापस नीचे उतरा। बारिश में भीगती अपनी दुबली-पतली कमजोर बकरियों को देखकर उसने सोचा कि अब जब मेरे पास इतनी सारी हट्टी-कट्टी भेडें हैं तो मुझे इन बकरियों की क्या ज़रुरत उसने फ़ौरन बकरियों को खोल दिया और बारिश में भीगने की परवाह किये बगैर कुछ रस्सियों की मदद से घास का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर लिया.

गट्ठर लेकर वह एक बार फिर गुफा में पहुंचा और काफी देर तक उन भेड़ों को अपने हाथ से हरी-हरी घास खिलाता रहा। जब तूफान थम गया, तो वह बाहर निकला। उसने देखा कि उसकी सारी बकरियां उस स्थान से कहीं और जा चुकी थीं।

गड़ेरिये को इन बकरियों के जाने का कोई अफ़सोस नहीं था, बल्कि वह खुश था कि आज उसे मुफ्त में एक साथ इतनी अच्छी भेडें मिल गयी हैं।  यही सोचते-सोचते वह वापस गुफा की ओर मुड़ा लेकिन ये क्या… बारिश थमते ही भेडें वहां से निकल कर दूसरी तरफ जान लगीं।  वह तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंचा और उन्हें अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगा। पर भेडें बहुत थीं, वह अकेला उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता था… कुछ ही देर में सारी भेडें उसकी आँखों से ओझल हो गयीं।

यह सब देख गड़रिये को गुस्सा आ गया। उसने चिल्लाकर बोला –

तुम्हारे लिए मैंने अपनी बकरियों को बारिश में बाहर छोड़ दिया। इतनी मेहनत से घास काट कर खिलाई… और तुम सब मुझे  छोड़ कर चली गयी… सचमुच कितनी स्वार्थी हो तुम सब।

गड़रिया बदहवास होकर वहीं बैठ गया। गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आ गया कि दरअसल स्वार्थी वो भेडें नहीं बल्कि वो खुद है, जिसने भेड़ों की लालच में आकर अपनी बकरियां भी खो दीं।

कहानी से सीख : लोभ का फल नामक यह कहानी हमें सिखाती है कि जो व्यक्ति स्वार्थ और लोभ में फंसकर अपनों का साथ छोड़ता है, उसका कोई अपना नहीं बनता और अंत में उसे पछताना ही पड़ता है।

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

फेसबुक फ्रेंड

अभय एक सीधा-साधा लड़का था। ग्रेजुएशन की पढाई करने के लिए अब उसे अपना गाँव छोड़कर शहर में दाखिला लेना था। किसान पिता ने एक-एक पैसा जोड़कर अभय के लिए शहर में सारी व्यवस्था कर दी और ये सोचकर एक स्मार्ट फोन भी दिला दिया कि ऑनलाइन पढाई करने में इसका उपयोग होगा।

स्वभाव से अंतर्मुखी अभय को अब अपने सपनों को पूरा करने के लिए बहुत मेहनत करनी थी। अपने संकोची स्वभाव के कारण  वह शहर के बच्चों के साथ उतना घुल-मिल नहीं पाया और दोस्त बनाने के लिए उसने सोशल मीडिया का सहारा लिया। ऐसे ही फेसबुक पर उसी शहर के मयंक नाम के एक लड़के से उसकी दोस्ती हो गई। मयंक का प्रोफाइल अभय को बहुत पसंद आया था। दोनों के बीच मैसेजेस का आदान-प्रदान होना शुरू हो गया।

पढाई के लिए लिए गए फोन का प्रयोग अब दोस्ती और मनोरंजक वीडियोस देखने में होने लगा। यहाँ तक की क्लास करते हुए भी अभय का ध्यान मोबाइल स्क्रीन पर ही लगा रहता।

मयंक और अभय की दोस्ती भी गहरी होती गयी, यहाँ तक कि मयंक कई बार उसका फ़ोन भी रिचार्ज करा देता।

देखते-देखते उनकी फ्रेंडशिप को दो-तीन महीने बीत गए, पर अभी भी उनकी एक बार भी मुलाक़ात नहीं हुई थी।

फिर एक दिन मयंक ने अभय को एक जगह बुलाने के लिए कॉल की, ” यार एक बहुत अच्छी opportunity है, तू सुबह दस बजे Whatsapp किये पते पर आ जा, अब पढाई के साथ -साथ तू हर महीने 5000 रु भी कमा सकता है, और इसी बहाने हम दोनों पहली बार face to face मिल भी लेंगे.”

अभय की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, दोस्त से मिलने की ख़ुशी और पैसा कमाने का अवसर मिलने की बात से वो फूला नहीं समा रहा था। अगले दिन वह सुबह जल्दी उठा और तैयार होकर मयंक के दिए पते की ओर बढ़ गया। वो जगह शहर से कुछ दूर थी, इसलिए अभय उधर जा रही एक बस पर सवार हो गया। एक घंटे के सफ़र के बाद आखिरकार वो पूछते-पाछते दिए हुए पते पर पहुंचा।

अभी वह दरवाजा खटखटाता की इससे पहले एक कार उसके पास आकर रुकी। उसमे से पैंताली-पचास साल का एक अधेड़ व्यक्ति बाहर निकला और बोला, “सुनो बेटा क्या तुम्हारा नाम अभय है?

“जी अंकल”, अभय बोला।

“मुझे मयंक ने भेजा है, दरअसल, अचानक मीटिंग का स्थान बदल गया है, आओ कार में बैठो मैं तुम्हे सही जगह ले चलता हूँ।”, व्यक्ति बोला।

अभय फौरन कार में बैठ गया और वे आगे बढ़ गए।

व्यक्ति ने अभय की केयर करते हुए उसे पीने के लिए फ्रूटी दी!

फ्रूटी पीने के करीब तीन घंटे बाद जब अभय की आँखें खुलीं तो उसने खुद को एक पार्क में लेटा हुआ पाया, उसे पेट के एक तरफ काफी दर्द महसूस हो रहा था, मोबाइल और पैसे भी गायब थे।

कुछ देर तक तो उसे समझ ही नहीं आया कि वो आखिर कार से यहाँ कैसे पहुँच गया। फिर उसने शर्ट उठा कर दर्द वाली जगह देखी तो वहां एक चीरा लगा हुआ था.

अभय का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह समझ चुका था कि उसके साथ कुछ बहुत गलत हो चुका है।

वह फ़ौरन भाग कर डॉक्टर के पास गया।

पर डॉक्टर ने जो बात उसे बताई, उसे सुनकर उसके पैरों तले जमीन ही खिसक गई। उसके शरीर से एक किडनी गायब थी। अब उसकी “काटो तो खून नहीं” वाली हालत हो गई।

सोचने लगा, “क्या सपने लेकर गांव से शहर आया था। अब अपने पिताजी को क्या जवाब देगा।”

वह भागा-भागा पुलिस के थाने पहुंचा। वहां जाकर तो उसके सामने डिजिटल दुनिया की सारी सच्चाई सामने आ गई। यह जो फेसबुक पर मयंक का प्रोफाइल था वह कोई युवा नहीं बल्कि वही अधेड़ व्यक्ति था जिसने उसे कार में बैठाया था।

वह आकर्षक अकाउंट बनाकर अभय जैसे लोगों को, जो सफलता शॉर्टकट में चाहते थे और ऐसे छलावे पे विश्वाश करते थे, फांसता था। फिर धीरे-धीरे पर्सनल लाइफ में घुसकर उन्हें नौकरी का झांसा देकर बुलाता। उसके बाद शरीर के अंगों की चोरी करता था। ऐसे कितने सारे cases उसके नाम थे।

सोशल मीडिया पर सोशल ना होकर अगर अभय वास्तविक  दुनिया में social होता तो शायद ऐसी नौबत ही नहीं आती। स्क्रीन के पीछे का सच अब आईने की तरह साफ हो चुका था। इतनी बड़ी ठोकर लगने के बाद अब उसने मोबाइल स्क्रीन पर अपना समय ग्नावाना बंद कर दिया। वास्तविक और आभासी दुनिया के बीच का फर्क अब उसकी समझ में आ चुका था ,पर बहुत कुछ खोने के बाद।

दोस्तों, ऑनलाइन वर्ल्ड में किसी पर आँख मूँद कर विश्वास करना आपको मुसीबत में डाल सकता है। इसलिए सोशल मीडिया और इन्टरनेट को प्रयोग पूरी सावधानी के साथ करें ताकि आपको कभी अभय की तरह पछताना ना पड़े।

किसान की समस्या – महात्मा बुद्ध की कहानी

 

एक बार एक गांव में एक किसान अपने दुखों से बहुत दुखी था। किसी ने उसको बताया कि तुम अपने दुखों के समाधान के लिए गौतम बुद्ध की शरण में जाओ, वह तुम्हारे सभी दुखों का समाधान कर देंगे। यह सुनकर वह किसान बुद्ध की शरण में चल पड़ा।

वह गौतम बुद्ध के पास पहुंचा और कहा हे महात्मा मैं एक किसान हूं और में अपनी जीविका चलाने के लिए खेती करता हूं। लेकिन कई बारवर्षा पर्याप्त नही होती है और मेरी फसल बर्बाद हो जाती है। किसान ने आगे कहा में विवाहित हूं, मेरी पत्नी मेरा ख्याल रखती है और में उससे प्रेम करता हूं, लेकिन कभी कभी वह मुझे परेशान करती है। जिससे मुझे लगता है कि में उससे उकता गया हूं और मुझे लगता है कि अगर वह मेरे जीवन में नही होती तो कितना अच्छा होता।

गौतम बुद्ध उस किसान की बात शांतिपूर्वक सुनते रहें।

किसान ने आगे कहना जारी रखा और बोला मेरे बच्चे भी है वो अच्छे हैं, लेकिन कभी-कभी वो मेरी बात नही मानते और उस समय मुझे बहुत क्रोध आता है, लगता है वो मेरे बच्चे हैं ही नहीं। किसान ऐसी ही बातें बुद्ध से करता गया और उसने अपने सारे दुखों को एक-एक करके बताया।

गौतम बुद्ध ध्यानपूर्वक उस किसान की समस्याओं को सुनते गए, उन्होंने बीच में एक शब्द भी

 नही कहा। किसान अपनी समस्याएं बताता चला गया और आखिर में किसान के पास बताने को कोई भी समस्या नही बची।

अपना मन हल्का हो जाने के बाद वह चुप हो गया और बुद्ध के जवाब की प्रतीक्षा करने लगा लेकिन बुद्ध ने कुछ नही कहा।

किसान अब और सब्र नहीं कर सकता था, वह आवाज़ ऊँची करते हुए बोला, “क्या आप मेरी समस्याओं का समाधान नही करेंगे?”

“मैं तुम्हारी कोई सहायता नही कर सकता।”, बुद्ध ने उत्तर दिया।

किसान को अपने कानो पर यकीन नहीं हुआ, “ये आप क्या कह रहे हैं, लोग तो बोलते हैं कि आप सभी के दुखों का निवारण कर देते है, तो क्या आप मेरे दुखों का निवारण नही करेंगे?”

बुद्ध ने कहा, “सभी के जीवन में कठिनाइयां होती हैं। तुम्हारे जीवन में कोई नई कठिनाई नही है। ये कठिनाइयां तो सभी के जीवन में आती जाती हैं। कभी मनुष्य सुखी होता है तो कभी दुःखी। कभी उसे पराए अपने लगते है और कभी उसे अपने लोग पराए लगने लगते है। ये जीवन चक्र है, इनसे कोई नही निकल सकता है। वास्तविकता में हमारा जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ है। मेरा, तुम्हारा और सभी लोगों का जीवन समस्याओं से ग्रसित है। इसलिए मैं इन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता हूं।

यदि तुम किसी एक समस्या का उपाय कर भी लो तो उसके स्थान पर एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी। यही जीवन का अटल सत्य है।

यह सुन कर किसान क्रोधित हो गया, बोला , “सब लोग कहते हैं  कि आप महात्मा हैं, मैं यहां एक आस लेकर आया था की आप मेरी सहायता करेंगे। अगर आप मेरी समस्याओं का समाधान ही नही कर सकते तो मेरा यहां आना व्यर्थ हुआ। इसका मतलब सभी लोग झूठ बोलते हैं, मैं बेकार ही आपके पास आया”

इतना बोलकर किसान उठ कर जाने लगा।

तभी बुद्ध ने कहा, “मैं तुम्हारी इन समस्याओं का समाधान तो नही कर सकता हूं, लेकिन हां मैं तुम्हारी एक दूसरी समस्या का समाधान कर सकता हूं।”

किसान ने आश्चर्य से कहा, “इन समस्याओं के अलावा दूसरी समस्या, भला वह कौन सी समस्या है?

बुद्ध ने कहा, वह यह कि –

तुम नही चाहते कि तुम्हारे जीवन में कोई समस्या हो।

इसी समस्या के कारण ही दूसरी कई समस्याओं का जन्म हुआ है। तुम इस बात को स्वीकार कर लो कि सभी के जीवन में समस्याएं होती हैं, कठिनाइयां होती हैं। तुम सोचते हो कि तुम इस दुनिया में सबसे ज्यादा दुःखी हो और तुम्हारे जितना कोई ओर दुःखी नहीं है!

तुम अपने आस पास देखो, क्या वो लोग तुमसे कम दुःखी हैं?

तुम्हें अपना दुःख बड़ा लगता है लेकिन जो लोग तुम्हारे आस-पास रहते हैं उनको उनका दुःख बड़ा लगता है। इस दुनिया में सभी को अपना दुःख बड़ा लगता है। चाहे दुःख छोटा हो या फिर बड़ा हो लेकिन वह जिसके साथ घट रहा है, उसके लिए वह दुःख बड़ा प्रतीत होता है।

अगर तुम ध्यानपूर्वक देखोगे तो समझ जाओगे कि यह जीवन सुख-दुःख से भरा हुआ है। इसको तुम कभी नही बदल सकते हो।

लेकिन हाँ, तुम सुख – दुःख से ऊपर अवश्य उठ सकते हो, यह तुम्हारे लिए संभव है।

सुख और दुःख को हम आने से रोक नही सकते है लेकिन सुख और दुःख का हम पर कोई प्रभाव न पड़े ऐसी व्यवस्था हम कर सकते हैं। और इसकी शुरुआत इस तथ्य को समझने के साथ शुरू होती है कि हम कुछ भी कर लें जीवन में सुख-दुःख आने ही आने हैं, लेकिन हमें उनसे विचलित नहीं होना चाहिए।

इसलिए आज से तुम यह चाहना छोड़ दो कि तुम्हारे जीवन में कोई समस्या ही ना आये, और तब तुम जीवन में आने वाले सुख-दुःख को स्वयं में समा सकोगे। तूफ़ान के मध्य में भी शांत रह सकोगे और हर्षोल्लास के शोर में भी संतुलित रह पाओगे।”

किसान बुद्ध की चरणों में गिर पड़ा! वह समझ चुका था कि अब उसे क्या करना है!

मित्रों, यह जीवन सुख-दुःख से भरा हुआ है। ऐसे में यह सोचन गलत है कि दुःख कभी आये ही नहीं। इस कहानी में भगवान् बुद्ध द्वारा कही गई बातें हमें दुःख से घबराने या सुख में अत्यंत उत्साहित होने की जगह एक संतुलित जीवन जीने का सन्देश देती हैं.  यदि आपको ये कहानी पसंद आई हो तो कृपया इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें।

धन्यवाद,

भगवान् से क्या मांगते थे स्वामी विवेकानंद ? | प्रेरक प्रसंग

 

1884 में स्वामी विवेकानन्द के पिता जी का स्वर्गवास हुआ और उनके जाते ही घर की स्थिति खराब हो गयी। जिन लोगो से उनके पिता ने कर्जा लिया था वे बार-बार घर पर पैसे माँगने आने लगे।
और उनके पैसे चुकाने में घर की सारी पूँजी चली गयी। उनकी चाची ने उनके परिवार को घर से अलग कर दिया। अब 7 सदस्यों के परिवार का भार नरेन्द्र ( स्वामी विवेकानन्द ) के ऊपर आ पड़ा था।

नरेन्द्र उस समय लॉ के प्रथम वर्ष में था। पर घर की परस्थितियों को देखते हुए उसने Law छोड़ दिया और नौकरी की तलाश करने लगा। घर की परिस्थितियाँ इतनी खराब हो गयीं थी कि कभी-कभी दिन में एक बार ही भोजन हो पाता था। नरेन्द्र दिन-दिन भर कम्पनियों के और ऑफिसों के चक्कर लगता था, ताकि एक नौकरी मिल सके, जिससे घर का खर्चा चल सके। पर बहुत प्रयास करने पर भी कोई नौकर नहीं मिली।

नरेन्द्र उस समय B.A. पास था इसलिए अधिकारी वर्ग के पदों के लिये आवेदन करता था। पर जब उसे कोई नौकरी नही मिली, तो फिर उसने क्लर्क के पदों पर भी आवेदन करना प्रारम्भ कर दिया।  दिन- दिन भर भूखे-प्यासे पैदल चलकर उसने कई इंटरव्यू दिये, पर कहीं भी उसे एक नौकरी नहीं मिल सकी।

इसी तरह एक दिन जब वह इंटरव्यू  में रिजेक्देट होकर लौट रहा था तभी अचानक सड़क के किनारे बेहोश होकर गिर पड़ा।

जब उसे होश आया तब वह घर पर था, लेकिन अब उसका भगवान् पर से विश्वास उठ गया। उसने मन ही मन सोचा –

यदि भगवान् होते तो क्या इतने प्रयास करने पर भी सफलता न देते ?

यह बात किसी ने जाकर दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में श्री रामकृष्ण परमहंस को बतायी।

उन्होनें कहा, “नहीं। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। तुम नरेन्द्र से मेरे पास आने के लिये कहना।”

कुछ समय बाद नरेन्द्र रामकृष्ण परमहंस के पास आये तो उन्होने मंदिर में माँ काली की प्रतिमा के समक्ष जाकर कुछ मांगने के लिये कहा।

नरेन्द्र मन्दिर में गया और ध्यानस्त बैठ कर आ गया।

परमहंस जी ने पूछा -“क्या माँगा” ?

उसने कहा – “ज्ञान और भक्ति”।

परमहंस जी ने कहा – “तुमने आपने घर की समस्या के बारे में तो कुछ माँगा ही नहीं। जाओ फिर से जाओ और अपनी बात कह कर आओ”।

ऐसा तीन बार हुआ। पर यह पूछने पर कि उसने क्या माँगा, एक ही जबाब मिलता –

“ज्ञान और भक्ति”

परमहंस जी ने कहा- तुम अपनी समस्या के बारे में क्यो नहीं कुछ माँगते ?

नरेन्द्र ने उत्तर दिया – “क्या ईश्वर से इतनी तुच्छ चीजे माँगूँ”।

परमहंस जी मुस्करा रहे थे और समझ चुके थे कि नरेन्द्र का ईश्वर से विश्वास नहीं उठा है। वह निराशा के कारण ऐसा बोल गया।

यही नरेन्द्र आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द हुए और शिकागो में दिए अपने भाषण से सम्पूर्ण विश्व में विख्यात हुए.

—-

मित्रों, नरेन्द्र जिस दौर से गुजरा वह दौर बहुतों की ज़िन्दगी में आता है, पर ऐसा होने पर आप घबराये नहीं और निराश तो बिलकुल भी न हो। ईश्वर ने आपके लिये कुछ और सोच रखा है।

सोचिये अगर स्वामी विवेकानन्द की एक क्लर्क की नौकर लग जाती, तो क्या होता, आज हम जिस रूप में उन्हें जानते हैं, शायद उस रूप में नहीं जानते।

इसलिये ईश्वर पर विश्वास रखो और सदैव अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहो.

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्वकर्मणि।। 2/ 47।।

 

 

 

चूहेदानी

 

बहुत समय पहले की बात है रहमान चाचा के यहाँ एक चूहा रहता था. हर दिन की तरह उस दिन भी बाज़ार से गाँव लौटते वक़्त चाचा झोले में कुछ सामान लेकर आये. झोले से बिस्कुट का पैकेट निकलते देख कर चूहे के मुंह में पानी आ गया, लेकिन ये क्या अगले ही पल उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई, चाचा आज बाकी सामन के साथ एक चूहेदानी भी खरीद कर लाये थे.

चूहा फ़ौरन भाग कर मुंडेर पर बैठे कबूतर के पास गया और घबड़ा कर कहने लगा – ” यार, आज बड़ी गड़बड़ हो गई, चाचा मुझे मारने के लिए चूहे दानी लेकर आये हैं, मेरी मदद करो किसी तरह इस चूहेदानी को यहाँ से गायब कर दो!”

कबूतर मुस्कुराया और बोला, ” पागल हो गया है, भला मुझे चूहेदानी से क्या खतरा, मैं इस चक्कर में नहीं पड़ने वाला. ये तेरी समस्या है तू ही निपट.”

चूहा और भी निराश हो गया और मुर्गो के पास हांफता हुआ पहुंचा, ” भाई मेरी मदद करो, चाचा चूहेदानी लेकर आये हैं….”

मुर्गे दाना चुगने में मस्त थे. चूहे से कन्नी काटते हुए बोले, “अभी हमारा खाने का टाइम है, तू बाद में आना.”

अब चूहा भागा-भागा बकरे के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई.

बकरा जोर-जोर से हंसने लगा, “यार तू पागल हो गया है, चूहेदानी से तुझे खतरा है मुझे नहीं. और तेरी मदद करके मुझे क्या मिलेगा? मैं कोई शेर तो हूँ नहीं जो शिकारी मुझे जाल में फंसा लेगा और तू मेरा जाल कुतर कर मेरी जान बचा लेगा!”

और ऐसा कह कर बकरा जोर-जोर से हंसने लगा.

बेचारा चूहा उदास मन से अपने बिल में वापस चला गया.

रात हो चुकी थी, चाचा और उनका परिवार खा-पीकर सोने की तैयारी कर रहे थे तभी खटाक की आवाज़ आई. चचा की छोटी बिटिया दौड़कर चूहेदानी की ओर भागी, सभी को लगा कि कोई चूहा पकड़ा गया है. कबूतर, मुर्गे और बकरे को भी लगा कि आदत से मजबूर चूहा खाने की लालच में मारा गया.

लड़की पलंग के नीचे हाथ डालकर चूहेदानी खींचेने लगी, तभी हिस्स की आवाज़ आयी…. ये क्या चूहेदानी में चूहा नहीं बल्कि एक ज़हरीला सांप फंस गया था और उसने बिजली की गति से फूंफकार मारते हुए बिटिया को डस लिया.

बिटिया की चीख सुन सब वहां इकठ्ठा हो गए.  रहमान चाचा सर पर पैर रख कर पड़ोस में रहने वाले ओझा के यहाँ भागे.

ओझा ने कुछ तंत्र-मन्त्र किया और बिटिया के हाथ पर एक लेप लगाते हुए बोले, बच्ची अभी खतरे से बाहर नहीं है, मुझे फ़ौरन कबूतर का कंठ लाकर दो मैं उसे उबालकर एक घोल तैयार करूँगा जिसे पीकर यह पूरी तराह स्वस्थ हो जायेगी.

ये सुनते ही रहमान चाचा कबूतर को पकड़ लाये. ओझा ने बिना देरी किये कबूतर का काम तमाम कर दिया.

बिटिया की हालत सुधरने लगी.

अगले दिन कई नाते – रिश्तेदार बिटिया का हाल-चाल जानने के लिए इकट्ठा हो गए. चाचा भी बिटिया की जान बचने से खुश थे और इसी ख़ुशी में उन्होंने सभी को मुर्गा खिलाने की ठानी.

कुछ ही घंटों में मूढ़ों का भी काम तमाम हो गया.

ये सब देख कर बकरा भी काफी डरा हुआ था पर जब सभी मेहमान चले गए तो वो भी बेफिक्र हो गया.

पर उसकी ये बेफिक्री अधिक देर तक नहीं रह पाई.

चची ने रहमान चाचा से कहा, “अल्लाह की मेहरबानी से आज बिटिया हम सबके बीच है, जब सांप ने काटा था तभी मैंने मन्नत मांग ली थी कि अगर बिटिया सही-सलामत बच गई तो हम बकरे की कुर्बानी देंगे. आप आज ही हमारे बकरे को कुर्बान कर दीजिये.

इस तरह कबूतर, मुर्गे और बकरा तीनो मारे गए और चूहा अभी भी सही-सलामत था.

दोस्तों, इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि जब हमारा दोस्त या पडोसी मुसीबत में हो तो हमें उसकी मदद करने की भरसक कोशिश ज़रूर करनी चाहिए. किसी समस्या को दूसरे की समस्या मान कर आँखें मूँद लेना हमें भी मुसीबत में डाल सकता है. इसलिए मुश्किल में पड़े मित्रों की मदद ज़रूर करें, ऐसा करके आप कहीं न कहीं खुद की ही मदद करेंगे.

 

 

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

वो सुनो जो ना कहा गया हो

 

बहुत समय पहले की बात है. चाइना के एक राजा ने अपने बेटे को अच्छा शासक बनाने के मकसद से एक जेन मास्टर के पास भेजा.

जेन मास्टर ने कुछ दिन अपने साथ रखने के बाद युवराज को एक साल के लिए जंगल में अकेले रहने के लिए भेज दिया.

जब युवराज लौटे तो मास्टर ने पूछा, “बताओ तुमने जंगल में क्या सुना?”

“मैंने कोयल की कूक सुनी, नदियों की कल-कल सुनी, पत्तियों की सरसराहट सुनी, मधुमक्खियों की गुंजन सुनी, मैंने झींगुरों का शोर सुना, हवा की धुन सुनी…” युवराज अपना अनुभव सुनाता चला गया.

जब युवराज ने अपीन बात पूरी कर ली तब मास्टर बोले, “अच्छा है, अब तुम एक बार फिर जंगल जाओ और जब तक तुम्हे कुछ नयी आवाजें ना सुनाई दे दें तब तक मत लौटना.”

एक साल जंगल में बिताने के बाद युवराज अपने राज्य को लौटना चाहता था, पर मास्टर की बात को टाल भी नहीं सकता था, इसलिए वह बेमन ही जंगल की ओर बढ़ चला.

कई दिन गुजर गए पर युवराज को कोई नयी आवाज़ नहीं सुनाई दी. वह परेशान हो उठा. उसने निश्चय किया कि अब वह हर आवाज़ को बड़े ध्यान से सुनेगा!

फिर एक सुबह उसे कुछ अनजानी सी आवाजें हल्की-हल्की सुनाई देने लगीं. इस घटना के कुछ दिनों बाद वह जेन मास्टर के पास वापस लौटा और बोला, “पहले ती मुझे वही ध्वनियाँ सुनाई दीं जो पहले देती थीं, लेकिन एक दिन जब मैंने बहुत ध्यान से सुनना शुरू किया तो मुझे वो सुनाई देने लगा जो पहले कभी नहीं सुनाई दिया था…. मुझे कलियों के खिलने की आवाज सुनाई देने लगी, मुझे धरती पर पड़ती सूर्य की किरणों, तितलियों के गीत, और घांस द्वारा सुबह की ओस पीने की ध्वनियाँ सुनाएं देने लगीं….”

यह सुनकर जेन मास्टर खुश हो गए और मुस्कुराकर बोले, “अनसुने को सुनने की क्षमता होना एक अच्छे राजा की निशानी है. क्योंकि जब कोई शासक अपने लोगों के दिल की बात सुनना सीख लेता है, बिना उनके बोले, उनकी भावनाओं को समझ लेता है, जो दर्द बयाँ न किया गया हो उसे समझ लेता है, अपने लोगों की अनकही शिकायतों को सुन लेता है, केवल वही अपनी प्रजा का विश्वास जीत सकता है, कुछ गलत होने पर उसे समझ सकता है और अपने नागरिकों की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरी कर सकता है. ”

दोस्तों, अगर हमें अपनी फील्ड का लीडर बनना है तो हमें भी वो सुनना सीखना चाहिए जो नहीं कहा गया है. यानी हमें उस युवराज की तरह बिलकुल अलर्ट हो कर अपना काम करना चाहिए और अपने साथ काम करने वालों की ज़रूरतों और भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए तभी हम खुद को एक ट्रू लीडर की तरह स्थापित कर सकेंगे.

 

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

अष्टावक्र ने कैसे तोड़ा आचार्य बंदी का अभिमान | अष्टावक्र की कहानी

 दोस्तों आपने कई ऋषि मुनियों की कहानियाँ सुनी होगी लेकिन आज मैं आपको  एक ऐसे विद्वान ऋषि की कहानी बताऊंगा जिसका लोहा हर किसी ने माना। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ महा विद्वान्  ऋषि अष्टावक्र की जिन्होंने अल्प अवस्था में ही एक दम्भी आचार्य का अभिमान चूर-चूर कर दिया था।

दीन-हीन अवस्था में दो भिक्षुक, जिसमें एक अष्टावक्र (शारीरिक रूप विकलांग थे उन्हें लाठी का सहारा लेकर चलना पड़ता था) एवं उनके एक साथी आश्रम के द्वार पर पहुंचतें है और द्वारपाल से पूछ्तें हैं:-

द्वारपाल हम आचार्य बंदी को ढूंढ रहें है? मैं उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती देने आया हूँ ।

(संयोग से उस दिन राजा जनक भी अपने दरबारियों के साथ उस आश्रम में आये हुए थे)

द्वारपाल:– ब्राम्हण पुत्रों तुम अभी बालक हो, आचार्य बंदी को चुनौती देने के बदले किसी आश्रम में जा कर शिक्षा ग्रहण करो !

दो भिक्षुक:- आग की एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे जंगल को जला कर ख़ाक कर सकती है! बाल पकने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता, न ही घनायु और कुलीन होने से कोई बड़ा, ज्ञान की साधना करने वाला ही वृद्ध और महत होता है, हम ज्ञान वृद्ध है, इसलिए हमें भीतर जाने दो और महाराज जनक और आचार्य बंदी को हमारे आगमन की सूचना दो!

अन्दर से महाराज जनक ने ये सुनकर द्वारपाल को कहा:- अश्वसेन उन्हें अन्दर आने दो।

लाठी का सहारा लेते हुए अष्टावक्र व् उनके साथी अन्दर आतें है और जैसे ही अध्ययनरत विद्यार्थियों के बीच पहुंचतें है तो सभी उनके विकलांग शरीर को देख कर हंसने लगतें हैं।

यह देख कर अष्टावक्र भी जोर-जोर से हंसने लगतें है, अष्टावक्र की हँसी देख कर सब चुप हो जातें है।

यह सब दृश्य देख कर महाराजा जनक अष्टावक्र से पूछ्तें है:- ब्राम्हण देवता आप सभा को देख कर इस तरह क्यों हँस रहे हैं?

अष्टावक्र :- (झुक कर जनक को प्रणाम करते हुए) महाराज मै तो यह सोच कर यहाँ आया था कि जनक की सभा में आकर इन विद्वानों के बीच मैं आचार्य बंदी को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दूंगा, लेकिन यहाँ आकर यह लगा कि यह तो मूर्खों की सभा है, मैंने अपने हंसने का कारण तो बता दिया अब आप अपने मूर्ख विद्वानों से पूछें कि वे किस पर हंसें?

मुझ पर या उस कुम्हार (भगवान) पर जिसने मुझे बनाया?

राजा जनक:- (खड़े हो कर हाथ जोड़ते हुए) ब्राम्हण कुमार मुझे और इन सभी को इस अज्ञान के लिए क्षमा करें, पर मेरा निवदन है कि अभी आप आचार्य बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिए वयस्क नहीं हुए हैं, आचार्य बंदी से शास्त्रार्थ करना कठिन है उनसे पराजित होने वाले को जल समाधि लेनी पड़ती है इसलिए आप और विद्याध्ययन करें।

अष्टावक्र :- राजन! आचार्य बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिए मुझ पर गुरु कृपा ही पर्याप्त है और जो अमर है उसे मृत्यु का क्या भय? किसी महान उद्देश्य के लिए प्राण देना मृत्यु नहीं होती आप आचार्य बंदी के सामने मुझे प्रस्तुत करें।

आचार्य बंदी :- (खड़े हो कर) मै हूँ आचार्य बंदी! (अभिमान के साथ) मै तुमसे शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार हूँ पर क्या तुम्हे मेरी शर्त स्वीकार है ?

अष्टावक्र का साथी:- एक ही बात बार-बार कह कर आप हमें भयभीत करने की नाकाम कोशिश क्यों कर रहें है?

आचार्य बंदी :- (हंसते हुए) चाहो तो तुम दोनों एक साथ मेरे साथ शास्त्रार्थ कर सकते हो!

अष्टावक्र :- मै एक हूँ और मै एक ही आपसे शास्त्रार्थ करूँगा।

दोनों शास्त्रार्थ के लिए बैठतें है ( शंखनाद होता है)

आचार्य बंदी :- प्रपंच क्या है?

अष्टावक्र :- जो कुछ दिखाई देता है जो कुछ भी, वो प्रपंच है।

अष्टावक्र :- जो दिखाई देता है का क्या तात्पर्य है ?

आचार्य बंदी :- जो दृष्टीगोचर है, मन और इन्द्रियों का विषय है जिसे मै स्वयं जानता हूँ वही दृश्य है।

आचार्य बंदी :- जो दृष्टा है उसे कौन जानता है? स्वयं को कौन देखता है?

अष्टावक्र :- उस स्वयं उस आत्म को देखने के लिए किसी के सहायता की ज़रुरत नहीं पड़ती जैसे सूर्य को प्रकाश के लिए दिये की ज़रूरत नहीं पड़ती, वह स्वयं प्रकाशमान है।

अष्टावक्र :- यह संसार कहाँ से आया?

आचार्य बंदी :- यह सृष्टि केवल और केवल उससे आयी।

आचार्य बंदी :- उससे का क्या तात्पर्य है ?

अष्टावक्र :- वह ब्रम्ह है, वह ईश्वर है, वह ही अपनी माया से इस संसार को रचता है, वह ही रचनाकार पालक और इस जगत का संघारक है।

अष्टावक्र :- ब्रम्ह इस संसार कि रचना पालन और संघार कैसे करता है?

आचार्य बंदी :- जिस प्रकार मकड़ी अपने जाल कि रचना करती है, उसी में विचरण करती है, फिर उसी को निगल जाती है, उसी प्रकार ईश्वर संसार कि रचना पालन और संघार करतें है।

आचार्य बंदी :- जीव क्या है?

अष्टावक्र :- जीव आत्मा है वह निर्विकार स्वयं है परन्तु अविद्या के प्रभाव में आकर स्वयं को मन और शरीर समझ बैठता है इसीलिए वह इस संसार का अनुभव करता है।

अष्टावक्र :- अविद्या क्या है?

आचार्य बंदी :- अनआत्मा को आत्मा समझना , निर्विकार को विकार युक्त समझना, अधिसंसार को ही सच समझना अविद्या है।

आचार्य बंदी :- विद्या क्या है?

अष्टावक्र :- आत्म का ज्ञान विद्या है. “सा विद्या या विमुक्तये” वह जो हमें सारे दुखों पीडाओं बंधनों अज्ञान प्रतियोगिताओं भ्रमात्मक कल्पनाओं से मुक्ति दिलाये वह विद्या है जो हमें द्वैत के भाव से, हम दो है के विचार से, तुम और मैं के भेद से मुक्ति दिलाये वह विद्या है, विद्या दृष्टी देती है जिससे मनुष्य अपने ब्रम्ह रूप को पहचान सके।

( सभी विद्वान एक स्वर में बोलतें है – साधू साधू साधू ।।। )

अष्टावक्र :- ब्रम्ह को जानने की प्रक्रिया क्या है?

आचार्य बंदी :- ब्रम्ह को जानने के दो मार्ग हैं :- पहला मार्ग यह जानना ब्रम्ह क्या नही है! जो ब्रम्ह नही है उसका निषेध करना सब नाम, गुण, रूप, सदोष और परिवर्तनशील वस्तु का निषेध कर निर्विकार को जानना।

दूसरा मार्ग – सत्य जैसा है उसे वैसा ही पहचानना, वह अस्तित्त्व रूप है उसके बिना संसार का अस्तित्व ही नही है, वह ब्रम्ह ही था, वह ब्रम्ह ही है, इसलिए मै ब्रम्ह हूँ, तुम ब्रम्ह हो, हम सब ब्रम्ह ही हैं
इसलिए सारा संसार ब्रम्ह है।

( सभी विद्वान एक स्वर में बोलतें है – साधू साधू साधू ।।। )

अष्टावक्र :- ब्रम्ह को कैसे जाना जा सकता है?

आचार्य बंदी :- ब्रम्ह को सही सामाजिक व्यवहार अध्यात्मिक चिंतन, ध्यानपूर्वक सुनने, नित्य अनुभवों पर विचार करने, निष्कर्षों पर मनन करने तथा समाधि में जा कर जाना जा सकता है।

आचार्य बंदी :- ब्रम्ह ज्ञानी के लक्षण क्या हैं ?

अष्टावक्र :- यदि कोई दावा करता है कि उसने ब्रम्ह को जान लिया है तो वह ब्रह्म को नहीं जानता, ब्रम्ह को जानने के साथ ही ब्रम्ह को जानने का अहंकार मिट जाता है।

आचार्य बंदी :- क्या उसे तर्क से जाना जा सकता है?

अष्टावक्र :- नहीं पर तर्क सहायक हो सकता है।

अष्टावक्र :- क्या उसे प्रार्थना और भक्ति से जाना जा सकता है?

आचार्य बंदी :- नहीं परन्तु प्रार्थना और भक्ति सहायक हो सकती है।

आचार्य बंदी :- क्या उसे योग व मनन से जाना जा सकता है?

अष्टावक्र :- नहीं पर योग व मनन सहायक हो सकते है।

( शास्त्रार्थ का अंत होता दिखाई नहीं दे रहा था, दोनों एक दूसरे पर भारी पड़ रहे थे कि अचानक बंदी को ये नहीं सूझता कि वह अष्टावक्र के प्रश्न का क्या उत्तर दें, वे मौन हो गये)

अष्टावक्र :- आचार्य! उत्तर दें, आचार्य! उत्तर दें।

इस पर भी आचार्य बंदी के शांत रहने पर सभी अष्टावक्र की जय जय कार करने लगते हैं।  उनके गले में फूलों की माला पहनाई जाती है।

महाराजा जनक भी उठ कर उनको माला पहनातें हैं और प्रणाम करतें है।

आचार्य बंदी :- मै अपनी पराजय स्वीकार करता हूं, मै जल समाधि लेने के लिए तैयार हूँ।

अष्टावक्र :- मै आपको जल समाधि देने नहीं आया हूँ आचार्य बंदी। याद होगा आप सबको कि आचार्य बंदी के अभिमान और इस प्रथा के कारण कितने निर्दोष विद्वानों की जान जा चुकी है । आचार्य बंदी याद करें आचार्य काहोड को मै उसी आचार्य कहोड का पुत्र हूँ, आज मै विजयी हूँ और आप पराजित। मै चाहूँ तो आपको जल समाधि दे सकता हूँ परतुं मै ऐसा नहीं करूँगा आचार्य बंदी। मेरा क्षमा ही प्रतिशोध है (रोते हुए) मै आपको क्षमा करता हूँ आचार्य बंदी।

आचार्य बंदी :- (रोते हुए) प्राण लेने से भी बड़ा दंड दिया है तुमने मुझे बाल ज्ञानी। मुझसे पाप हुआ है, पाप हुआ है मुझसे।

अष्टावक्र :- पश्चाताप की आग से बड़ी  कोई आग नहीं आचार्य बंदी। हर दिन इस आग में जल पवित्र हो। यही आपका प्रायश्चित होगा, शास्त्र को शस्त्र न बनाओ।

महाराज ! शास्त्र जीवन का विकास करतें है। शस्त्र जीवन का विनाश। जितना पुराना है हिमालय जितनी पुरानी है गंगा उतना ही पुराना है ये सत्य- हिंसा से कभी किसी ने किसी को नहीं जीता।

सभी उठ कर उनको प्रणाम करतें है और अष्टावक्र प्रस्थान करतें है।

दोस्तों, पौराणिक काल की यह वास्तविक घटना हमें अभिमान से दूर रहने की सीख देती है साथ ही ये हमें सिखाती है कि भले किसी ने हमारे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया हो पर हमारी सच्ची जीत उसे क्षमा करने में है दंड देने में नहीं।