गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

जामुन का पेड़! | समय के साथ बदलने की सीख देती कहानी

 जंगल के बीचो बीच जामुन का एक बहुत पुराना वृक्ष था. पीढ़ियों से गिलहरियों का एक परिवार उस वृक्ष पर रहता आ रहा था.

वह वृक्ष उन्हें हर वो चीज देता आ रहा था जो जीने के लिए ज़रूरी थी…खाने के लिए फल, रहने के लिए अपने खोखले तनों में आसरा और खतरनाक पक्षीयों और जानवरों से सुरक्षा. यही वजह थी कि आज तक गिलहरियों के कुनबे में से किसी ने कहीं और जाने की नहीं सोची थी.

लेकिन अब परिस्थितियां बदल रहीं थीं… हर चीज जो शुरू हुई है वो ख़त्म भी होती है…अब जामुन के पेड़ का भी अंत निकट था…उसकी मजबूत जडें अब ढीली पड़ने लगी थीं… जामुन के फलों से लदे रहने वाले उसे पेड़ पर अब मुश्किल से ही जामुन खाने को मिल रहे थे.

यह एक आपात स्थिति थी और गिलहरी परिवार ज्यादा दिनों तक इसकी अनदेखी नहीं कर सकता था… अंततः एक मीटिंग बुलाई गयी.

सबसे बुजुर्ग होने के कारण अकड़ू गिलहरी ने मीटिंग की अध्यक्षता की और अपनी बात रखते हुए कहा, “मित्रों ये पेड़ ही हमारी दुनिया है… यही हमारा अन्न दाता है…इसने सदियों से हमारे पूर्वजों का पेट पाला है… हमारी रक्षा की है…आज भले ही इसपर फल आने कम हो गए हैं… इसकी जडें कमजोर पड़ गयी हैं पर फिर भी यह हम सबको आश्रय देने के लिए पर्याप्त है… और भगवान की कृपा हुई तो क्या पता ये कुछ दिनों में ये वापस ठीक हो जाए? अतः हम सबको यहीं रहना चाहिए और ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए.”

सभी गिलहरियों ने अकड़ू की हाँ में हाँ मिलायी लेकिन गिल्लू गिलहरी से रहा नहीं गया और उसने हाथ उठाते हुए कहा, “मुझे कुछ कहना है.”
“क्या कहना है? हम भी तो सुनें”, अकड़ू कुछ अकड़ते हुए बोला.

“क्यों न हम एक नया पेड़ तलाशें और अपना परिवार वहीँ ले चलें… क्योंकि इस पेड़ का अंत निकट है, हो सकता है हम कुछ महीने और यहाँ काट लें…पर उसके बाद क्या? हमें कभी न कभी तो इस पेड़ को छोड़ना ही होगा.”

“बेकार की बात करना छोडो गिल्लू… नए खून के जोश में तुम ये भूल रहे हो कि इस पेड़ के बाहर कितना खतरा है… जो कोई भी यहाँ से जाने की सोचेगा उसे बाज, लोमड़ी या कोई अन्य जानवर मार कर खा जाएगा… और भगवान पर भरोसा भी तो कोई चीज होती है !” ,अकड़ू ने ऊँची आवाज़ में गिल्लू को समझाया.

“चाचा, खतरा कहाँ नहीं है… सच कहूँ तो इस समय नया घर खोजने का खतरा ना उठाना  ही हमारे परिवार के लिए सबसे खतरनाक चीज है…और जहाँ तक भगवान पर भरोसे की बात है तो अगर हम उस पर इस मरते हुए पेड़ में जान डालने का भरोसा कर सकते हैं तो नया घर खोजते वक़्त हमारी जान की रक्षा करने का भरोसा क्यों नहीं दिखा सकते…. आप लोगों को जो करना है करिए मैं तो चला नया घर ढूँढने!”, और ऐसा कहते हुए गिल्लू जामुन का पेड़ छोड़ कर चला गया.

गिल्लू के जाने के कई दिनों बाद तक उसकी कोई खबर नहीं आई. इस पर अकड़ू सबको यही कहता फिरता, “मैंने मना किया था… बाहर जान का खतरा है… पर वो सुनता तब तो… मारा गया बेकार में..”

बाकी गिलहरियाँ अकड़ू की बात सुनतीं पर समय के साथ-साथ उस धराशायी हो रहे पेड़ पर रहना मुश्किल होता जा रहा था. इसलिए गिलहरी परिवार ने एक और मीटिंग बुलाई. इस बार परिवार दो हिस्सों में बंट गया कुछ गिलहरियाँ गिल्लू की राह पर चलते हुए खतरा उठाने को तैयार हो गयीं और बाकी सभी अकड़ू की राह पर चलते हुए कोई खतरा नहीं उठाना चाहती थीं.

कुछ एक महीने और बीते, जामुन के पेड़ पर फल गायब हो चुके थे… उस पर रह रही गिलहरियाँ बिलकुल कमजोर हो चुकी थीं और अब उनमे कुछ नया करने की हिम्मत भी नहीं बची थी… धीरे-धीरे अकड़ू और बाकी गिलहरियाँ मरने लगीं और वहां से करीब 100 मीटर की दूरी पर गिल्लू और बाकी गिलहरियाँ एक दुसरे जामुन के पेड़ पर हंसी-ख़ुशी अपना जीवन जी रही थीं.

दोस्तों, हम सभी किसी न किसी जामुन के पेड़ पर बैठे हुए हैं… हम जिस भी industry में हैं…जो भी business कर रहे हैं वह धीरे-धीरे obsolete हो रहा है या उसे करने का तरीका तेजी से बदल रहा है… even सरकारी नौकरियां भी अब पहले की तरह नहीं रहीं. ऐसे में अगर हम अकड़ू की तरह बदलाव को resist करेंगे…बदल रही conditions को ignore करेंगे और खुद को नयी परिस्थितियों के हिसाब से नहीं ढालेंगे तो बहुत जल्द हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.

For example: Nokia कभी मोबाइल फोंस में world leader था पर उसने खुद को smart phones के हिसाब से तैयार नहीं किया और उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया.

हमें गिल्लू की तरह proactive होना चाहिए और मुसीबत सर पर आने से पहले ही उससे बचने के उपाय करने चाहिए…हमें अपनी स्किल्स अपने काम करने के तरीके को changing circumstances के अनुसार upgrade करना चाहिए वरना बाद में उन गिलहरियों की तरह ना हमारे पास ऐसा करने की हिम्मत बचेगी और ना ही ताकत.

 

मिट्टी का दिल | क्रोध पर कहानी

 पंकज एक गुस्सैल लड़का था. वह छोटी-छोटी बात पर नाराज़ हो जाता और दूसरों से झगड़ा कर बैठता. उसकी इसी आदत की वजह से उसके अधिक दोस्त भी न थे.

पंकज के माता-पिता और सगे-सम्बन्धी उसे अपना स्वभाव बदलने के लिए बहुत समझाते पर इन बातों का उसपर कोई असर नहीं होता.

एक दिन पंकज के पेरेंट्स को शहर के करीब ही किसी गाँव में रहने वाले एक सन्यासी बाबा का पता चला जो अजीबो-गरीब तरीकों से लोगों की समस्याएं दूर किया करता था.

अगले दिन सुबह-सुबह वे पंकज को बाबा के पास ले गए.

बाबा बोले, “जाओ और चिकनी मिटटी के दो ढेर तैयार करो.

पंकज को ये बात कुछ अजीब लगी लेकिन माता-पता के डर से वह ऐसा करने को तैयार हो गया.

कुछ ही देर में उसने ढेर तैयार कर लिया.

बाबा बोले, “अब इन दोनों ढेरों से दो दिल तैयार करो!”

पंकज ने जल्द ही मिटटी के दो हार्ट शेप तैयार कर लिए और झुंझलाते हुए बोला, “हो गया बाबा, क्या अब मैं अपने घर जा सकता हूँ?”

बाबा ने उसे इशारे से मना किया और मुस्कुरा कर बोले, “अब इनमे से एक को कुम्हार के पास लेकर जाओ और कहो कि वो इसे भट्टी में डाल कर पका दे.”

पंकज को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि बाबा करना क्या चाहते हैं पर अभी उनकी बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा न था.
दो-तीन घंटे बाद पंकज यह काम कर के लौटा.

“यह लो रंग और अब इस दिल को रंग कर मेरे पास ले आओ!”, बाबा बोले.

“आखिर आप मुझसे कराना क्या चाहते हैं? इन सब बेकार के टोटकों से मेरा गुस्सा कम नहीं हो रहा बल्कि बढ़ रहा है!”, पंकज बड़बड़ाने लगा.

बाबा बोले, “बस पुत्र यही आखिरी काम है!”

पंकज ने चैन की सांस ली और भट्टी में पके उस दिल को लाल रंग से रंगने लगा.रंगे जाने के बाद वह बड़ा ही आकर्षक लग रहा था. पंकज भी अब कहीं न कहीं अपनी मेहनत से खुश था और मन ही मन सोचा रहा था कि वो इसे ले जाकर अपने रूम में लगाएगा.

वह अपनी इस कृति को बड़े गर्व के साथ बाबा के सामने लेकर पहुंचा.

पहली बार उसे लग रहा था कि शायद बाबा ने उससे जो-जो कराया ठीक ही कराया और इसकी वजह से वह गुस्सा करना छोड़ देगा.
“तो हो गया तुम्हारा काम पूरा?”, बाबा ने पूछा.

“जी हाँ, देखिये ना मैंने खुद इसे लाल रंग से रंगा है!”, पंकज उत्साहित होते हुए बोला.

“ठीक है बेटा, ये लो हथौड़ा और मारो इस दिल पर.”, बाबा ने आदेश दिया.

“ये क्या कह रहे हैं आप? मैंने इतनी मेहनत से इसे तैयार किया है और आप इसे तोड़ने को कह रहे हैं?”, पंकज ने विरोध किया.
इस बार बाबा गंभीर होते हुए बोले, “मैंने कहा न मारो हथौड़ा!”

पंकज ने तेजी से हथौड़ा अपने हाथ में लिए और गुस्से से दिल पर वार किया.

जिस दिल को बनाने में पंकज ने आज दिन भर काम किया था एक झटके में उस दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए.

“देखिये क्या किया आपने, मेरी सारी मेहनत बर्बाद कर दी.”

बाबा ने पंकज की इस बात पर ध्यान न देते हुए अपने थैले में रखा मिट्टी का दूसरा दिल निकाला और बोले, “चिकनी मिट्टी का यह दूसरा दिल भी तुम्हारा ही तैयार किया हुआ है… मैं इसे यहाँ जमीन पर रखता हूँ… लो अब इस पर भी अपना जोर लगाओ…”

पंकज ने फ़ौरन हथौड़ा उठाया और दे मारा उस दिल पर.

पर नर्म और नम होने के कारण इस दिल का कुछ ख़ास नहीं बिगड़ा बस उसपर हथौड़े का एक निशान भर उभर गया.

“अब आप खुश हैं… आखिर ये सब कराने का क्या मतलब था… मैं जा रहा हूँ यहाँ से!”, पंकज यह कह कह कर आगे बढ़ गया.

“ठहरो पुत्र!,” बाबा ने पंकज को समझाते हुए कहा, “जिस दिल पर तुमने आज दिन भर मेहनत की वो कोई मामूली दिल नहीं था… दरअसल वो तुम्हारे असल दिल का ही एक रूप था.

तुम भी क्रोध की भट्टी में अपने दिल को जला रहे हो… उसे कठोर बना रहे हो… ना समझी के कारण तुम्हे ऐसा करना ताकत का एहसास दिलाता है… तुम्हे लगता है की ऐसा करने से तुम मजबूत दिख रहे हो… मजबूत बन रहे हो… लेकिन जब उस हथौड़े की तरह ज़िंदगी तुम पर एक भी वार करेगी तब तुम संभल नहीं पाओगे… और उस कठोर दिल की तरह तुम्हारा भी दिल चकनाचूर हो जाएगा!

समय है सम्भल जाओ! इस दूसरे दिल की तरह विनम्र बनो… देखो इस पर तुम्हारे वार का असर तो हुआ है पर ये टूट कर बिखरा नहीं… ये आसानी से अपने पहले रूप में आ सकता है… ये समझता है कि दुःख-दर्द जीवन का एक हिस्सा है और उनकी वजह से टूटता नहीं बल्कि उन्हें अपने अन्दर सोख लेता है…जाओ क्षमाशील बनो…प्रेम करो और अपने दिल को कठोर नहीं विनम्र बनाओ!”

पंकज बाबा को एक टक देखता रह गया. वह समझ चुका था कि अब उसे कैसा व्यवहार करना है!

भगवान राम के जीवन से जुड़े 5 प्रेरक प्रसंग

 अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा पाकर श्रीराम सीता मैया और लक्षमण जी के साथ 14 वर्ष का वनवास काटने के लिए अयोध्या से प्रस्थान कर गए. इसके बाद वे प्रयाग (इलाहाबाद), चित्रकूट, पंचवटी ( नासिक ), दण्डकारण्य, लेपक्षी, किश्किन्दा, रामेश्वरम, आदि स्थानों पर रहे और इस दौरान उनके साथ कई प्रसंग घटे.

प्रसंग #1 –  शूर्पणखा की नाक काटना

जब भगवान् राम पंचवटी में रह रहे थे तभी एक दिन रावण की बहन शूर्पणखा एक सुंदरी का रूप धारण कर उनके पास आई और उनके दिव्य स्वरुप से मोहित हो कर उनसे विवाह करने के लिए कहने लगी.

इस पर श्रीराम ने अपनी पतिव्रता पत्नी सीता के बारे में बताया और कहा कि वह उनके अनुज लक्ष्मण के पास जाए.

जब शूर्पणखा ने लक्षमण जी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो वह बोले, ” हे सुंदरी! मैं तो भगवान् राम का दास हूँ यदि तुमने मुझसे विवाह किया तो तुम्हे भी उनकी दासी बनना पड़ेगा. और यह तो तुम्हारे सम्मान के विरुद्ध होगा. तुम राम भैया के पास जाओ वही सबके स्वामी हैं वही सबकुछ करने में समर्थ हैं.

यह सुनकर शूर्पणखा क्रोध से लाल हो गयी और रामजी से बोली, “शायद तुम्हे मेरी असीम शक्ति का ज्ञान नहीं है, जो तुम मेरे निवेदन को ठुकरा कर मेरा उपहास कर रहे हो.”

और ऐसा कह कर वह अपने असली रूप में आ गयी और सीता मैया को खाने के लिए दौड़ी.

यह देख श्री राम ने लक्षमण को उसे दण्डित करने का संकेत दे दिए और लक्षमण जी ने अपनी तलवार से उसके नाक-कान काट दिए.

प्रसंग #2 – खर-दूषण से युद्ध

नाक-कान कटने के बाद शूर्पणखा खून से लथपथ अपने भाइयों खर-दूषण के पास दौड़ी गयी और खर से बोली, “भाई! धिक्कार है तुम्हारे बल और पराक्रम पर. आज तुम्हारे राज्य में साधारण मनुष्यों की हिम्मत इतनी बढ़ गयी है कि उन्होंने मेरा ये हाल करने का दुःसाहस कर दिया है.”
और शूर्पणखा ने अपने साथ घटी घटना बता दी.

यह सुन कर खर क्रोधित हो उठा और तत्काल अपने भाई दूषण और 14 हज़ार राक्षसों की सेना लेकर राम-लक्षमण पर आक्रमण करने के लिए निकल पड़ा. उसकी इस विशाल सेना में एक से बढ़ कर एक पराक्रमी व दिव्यास्त्रों से सुसज्जित राक्षस मौजूद थे.

उनके आने का कोलाहल सुनकर श्रीराम ने लक्षमण जी से सीता मैया को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाने को कहा और स्वयं अपना धनुष और अक्षयबाण वाले दो तरकस बाँध कर तैयार हो गए.

जल्द ही राक्षस वहां आ पहुंचे और नाना प्रकार के अश्त्रों-शश्त्रों से उन पर वार करने लगे. पर श्रीराम ने एक-एक कर के उनके सारे अश्त्र -शश्त्र काट डाले और सहस्त्रों बाणों से खर-दूषण समेत समस्त राक्षसों का संहार कर दिया.

इस प्रकार रघुवंशियों में श्रेष्ठ श्रीराम ने आधे पहर में ही इतनी विशाल और सूरवीरों से भरी सेना को अकेले ही समाप्त कर दिया.

प्रसंग #3 – जटायु पर कृपा

जब मारीच की मदद से रावण सीता मैया का हरण कर अपने पुष्पक विमान से उन्हें लंका ले जा रहा था तब उनकी वेदनापूर्ण पुकार सुन गिद्धराज जटायु उन्हें बचाने के लिए तत्पर हो गया और वायु वेग से रावण की ओर उड़ चला.

जटायु ने अपनी पूरी शक्ति से रावण पर आक्रमण किया और उसे नीचे गिरा दिया. पर अगले ही क्षण रावण ने अपनी कटार से जटायु के पंख काट दिए और पुनः सीताजी को लंका की ओर ले उड़ चला.

उधर जब राम-लक्षमण को सीता जी आश्रम में नहीं मिलीं तो वे फ़ौरन उन्हें ढूँढने निकले. मार्ग में उन्हें घायल अवस्था में जटायु मिला. उसने सिर्फ भगवान् के दर्शन करने के लिए अपने प्राणों को रोक रखा था.

श्रीराम ने रक्त में डूबे जटायु के सिर पर अपना हाथ फेरा. उनका दर्शन व स्पर्श पा कर जटायु की पीड़ा जाती रही और वह बोला, “हे नाथ! लंकापति रावण ने मेरी ये दशा की है. उसने सीता मैया का हरण कर दक्षिण दिशा की ओर रुख किया है… बस यही सूचना देने के लिए मैं अभी तक जीवित था. कृपया मुझे यह शरीर छोड़ने की आज्ञा दीजिये.”

भगवान् राम द्रवित होते हुए बोले-

“हे तात! अपने परहित में अपने तन का त्याग किया है, निश्चित ही आपको मेरे परमधाम की प्राप्ति होगी.”

और तत्काल ही जटायु चतुर्भुज रूप धारण कर भगवान् की स्तुति करते हुए परमधाम को चले गये

प्रसंग #4 – शबरी की भक्ति

सीता जी की खोज करते हुए श्रीराम भक्तिमती शबरी के आश्रम पहुंचे. उन्हें देखते ही शबरी आनंद विभोर हो गयी, वह भगवन के चरणों में गिर पड़ी और उसके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी.

इसके बाद उसने राम-लक्ष्मण की पूजा की और खाने के लिए फल प्रस्तुत किये. नोट: कई जगह शबरी द्वारा श्रीराम को अपने झूठे बेर खिलाने की बात आती है, पर इस बात को लेकर सभी एकमत नहीं हैं.

शबरी ने बताया कि वह हजारों वर्षों से इस आश्रम में रह रही है और उसके गुरु महर्षि मतंग ने ब्र्हम्लोक जाने से पहेल उसे बताया था कि सनातन परमात्मा ने राक्षसों का संहार करने के लिए और ऋषियों की रक्षा करने के लिए महाराज दशरथ के यहाँ पुत्र रूप में अवतार लिया है और वह शीघ्र तुम्हे दर्शन देने के लिए यहाँ आयेंगे.

शबरी बोली, “हे रघुनन्दन! मैं नीच कुल में उत्पन्न एक अनपढ़ गंवार नारी हूँ. मैं तो आपके दासों का दास बनने योग्य भी नहीं हूँ, फिर भी आपने मुझे दर्शन दिए, मैं नहीं समझ पा रही कि मैं कैसे आपकी स्तुति करूँ.”

भगवान् बोले-

“हे भामिनी! स्त्री-पुरुष, नाम, जाति और आश्रम – ये कोई भी मेरी कृपा के कारण नहीं हैं. मैं तो बस अपने भक्तों के वश में हूँ, और जो मेरी भक्ति करता है वह स्वतः ही मेरी कृपा का पात्र बन जाता है. इसीलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ. मेरे इस दर्शन से तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी.”

इसके बाद शबरी ने रावण द्वारा सीता हरण के विषय में बताया और वनराज सुग्रीव से मित्रता करने की बात कही. और फिर शबरी ने श्रीराम के समक्ष ही खुद को योगाग्नि में भस्म कर परमधाम की प्राप्ति की.

 

प्रसंग #5 – बालि वध

बालि सुग्रीव का बड़ा भाई था. वह अत्यंत बलशाली था और उसे आशीर्वाद प्राप्त था कि जो कोई भी उससे लड़ने आएगा उसकी आधी शक्ति क्षीण हो जायेगी और बालि को प्राप्त हो जायेगी.

बालि ने सुग्रीव की पत्नी पर कुदृष्टि डाली थी और उस पर अपना आधिपत्य जमा सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया था.

श्रीराम से मित्रता होने और उनका आश्वासन मिलने के बाद सुग्रीव ने पुनः बालि को युद्ध के लिए ललकारा. इस दौरान श्रीराम एक वृक्ष के पीछे खड़े हो बालि का वध करने का अवसर खोजने लगे.

पर दोनों भाइयों की मुख व काया एक सामान होने के कारण वे समझ ना सके कि किस पर तीर छोड़ा जाए और इस कारण से सुग्रीव को एक बार फिर युद्ध में परास्त हो वापस आना पड़ा.

पर कुछ ही देर में वह पुनः फूलों की एक माला पहन बालि को लकारने पहुंचा. इस बार श्रीराम ने दोनों भाइयों में आसानी से अंतर कर लिया और बालि पर अपना बाण छोड़ दिया.

बालि धराशायी हो गया और तिरस्कार पूर्वक बोला, “हे राम! मैंने आपका क्या बिगाड़ा था जो आपने इस तरह मुझे मारा? एक क्षत्रीय होने के नाते आप सामने से युद्ध करते तब आपका यशगान होता, बताइये इस तरह मुझे मार कर आपको कौन सा पुण्य मिल गया?”

तब श्रीराम ने कहा-

“मैं धर्म की रक्षा करने के लिए ही इस लोक में धनुष धारण कर विचरण कर रहा हूँ. छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्रवधू और कन्या – ये चारों सामान ही हैं. जो मूढ़ इनमे से एक के साथ भी रमण करता है; राजा का कर्तव्य है कि वह उसे मृत्युदण्ड दे. इसीलिए मैंने तेरे साथ युद्ध नहीं किया अपितु तुझे दण्ड दिया है.”

इसके बाद बालि ने अपनी करनी के लिए क्षमा मांगी और अपने प्राण त्याग दिए और इन्द्र्रूप में देवलोक चला गया.

 

भगवान् महावीर से जुड़ी 3 बेहद रोचक कहानियां

 

ज्ञान की खोज में महावीर नंगे पाँव एक स्थान से दूसरे स्थान विचरण करते हुए घनघोर तपस्या कर रहे थे. एक बार वह श्वेताम्बी नगरी जा रहे थे जिसका रास्ता एक घने जंगल से होकर गुजरता था, जिसमे चंडकौशिक नाम का एक भयंकर सर्प रहता था.उस सर्प के बारे में प्रसिद्द था कि वह सदा क्रोध में रहता था और उसके देखने मात्र से ही पक्षी, जानवर या इंसान मृत हो जाते थे.

जब महावीर उस जंगल की ओर बढे तो ग्रामीणों ने उन्हें चंडकौशिक के बारे में बताया और उधर न जाने का निवेदन किया.

पर अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले महावीर तो भयरहित थे. उन्हें किसी के प्रति नफरत नहीं थी, और वे डर और नफरत को स्वयम के प्रति हिंसा मानते थे. उनके चेहरे पर एक तेज था और वे साक्षात करुणा की मूर्ती थे.

उन्होंने गाँव वालों को समझाया कि वे भयभीत न हों और जंगल में प्रवेश कर गए.

कुछ देर चलने के बाद जंगल की हरियाली क्षीण पड़ने लगी और भूमि बंजर नज़र आने लगी. वहां के पेड़ पौधे मृत हो चुके थे और जीवन का नामोनिशान नहीं था.

महावीर समझ गए कि वह चंडकौशिक के इलाके में आ चुके हैं. वे वहीँ रुक गए और ध्यान की मुद्रा में बैठ गए. महावीर के ह्रदय से प्रत्येक जीव के कल्याण के लिए शांति और करुणा बह रही थी.

महावीर की आहट सुन चंडकौशिक फौरन सतर्क हो गया और अपने बिल से बाहर निकला. महावीर को देखते ही वह क्रोध से लाल हो गया

और मन ही मन सोचा, “इस तुच्छ मनुष्य की यहाँ तक आने की हिम्मत कैसे हुई?”

वह महावीर की ओर अपना फेन ऊँचा कर फुंफकारने लगा…हिस्स…हिस्स..

पर महावीर तो शांतचित्त हो अपनी ध्यान मुद्रा में बैठे रहे और जरा भी विचलित नहीं हुए.

यह देख चंडकौशिक और भी क्रोधित हो गया और उनकी ओर बढ़ते हुए अपना फन हिलाने लगा.

महावीर अभी भी शांति से बैठे रहे और न भागने की कोशिश की ना भयभीत हुए. सर्प का क्रोध बढ़ता जा रहा था, उसने फ़ौरन अपना ज़हर महावीर के ऊपर उड़ेल दिया.

पर ये क्या महवीर तो अभी भी ध्यानमग्न थे, उस घटक विष का उनपर कोई असर नही हो रहा था.

चंडकौशिक को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई मनुष्य उसके विष से बच सकता है, वह बिजली की गति से आगे बढ़ा और महवीर के अंगूठे में अपने दांत गड़ा दिए.

पर ये क्या महवीर अभी भी ध्यानमग्न थे और उनके अंगूठे से खून की जगह दूध बह रहा था.

अब महावीर ने अपनी आँखें खोली. वह शांत थे उनके मुख पर न कोई भय था ना ही क्रोध. वे चंडकौशिक की आँखों में देखते हुए बोले-

उठो!उठो! चंडकौशिक सोचो तुम क्या कर रहे हो!

उनके वाणी में प्रेम और स्नेह था.

चंडकौशिक ने इससे पहले कभी इतना निर्भय और वात्सल्यपूर्ण प्राणी नहीं देखा था, वह शांत हो गया. अचानक ही उसे अपने पिछले जन्म याद आने लगे, अपने क्रोध और अभिमान के कारण आज वह जिस स्थिति में पहुँच गया था वह उसे ज्ञात हो गया. अचानक आये इस ज्ञान से उसका ह्रदय परिवर्तन हो गया वह प्रेम और अहिंसा का पुजारी बन गया.

महावीर के जाने के बाद उसने चुपचाप अपना सिर बिल के अन्दर कर लिया जबकि उसका बाकी का शरीर बहार ही था.

धीरे-धीरे यह बात सभी को ज्ञात हो गयी कि चंडकौशिक बदल गया है. बहुत से लोग उसे नाग-देवता मान कर दूध, घी इत्यादि से पूजने लगे तो कई लोग जिन्होंने उसके विष के कारण अपने प्रियजन खोये थे उस पर ईंट-पत्थर फेंकने लगे.

चंडकौशिक न क्रोधित हुआ न किसी का विरोध नहीं किया और लुहू-लुहान उसी अवस्था में पड़ा रहा. रक्त, दूध, मिष्टान आदि कि वजह से जल्द ही वहां चींटियों के झुण्ड के झुण्ड आ पहुंचे. चींटियों के काटने के बावजूद वह अपने स्थान से नहीं हिला कि कहीं कोई चींटी दब कर मर ना जाए.

अपने इस आत्म संयम और भावनाओं पर नियंत्रण के कारण उसके कई पाप कर्म नष्ट हो गए और मृत्युपरांत वह स्वर्ग को प्राप्त हुआ.

 

सुखिया और दुखिया | दो लकड़हारों की कहानी

 बहुत समय पहले की बात है जंगल के करीब एक गाँव में दुखिया और सुखिया नाम के दो लकड़हारे रहते थे. एक सुबह जब वे जंगल में लकड़ियाँ काटने गए तो उनकी आँखे फटी की फटी रह गयी.

लकड़ी की तस्करी करने वाली गैंग ने बहुत सारे पेड़ काट दिए थे और बड़े-बड़े ट्रक्स में लकड़ियाँ भर ले गए थे.

ये देखते ही दुखिया क्रोधित हो गया, “देख सुखिया क्या किया उन तस्करों ने… मैं उन्हें छोडूंगा नहीं…. मैं गाँव के हर घर जाऊँगा और इस घटना की शिकायत करूँगा… क्या तुम भी मेरे साथ चलोगे…”

“तुम चलो मैं बाद में आता हूँ.”, सुखिया बोला.

“बाद में आता हूँ??? क्या मतलब है तुम्हारा इतनी बड़ी घटना हो गयी और तुम हाथ पे हाथ धरे बैठे रहोगे… चल के सबको इसके बारे में बताओगे नहीं?”, दुखिया हैरान होते हुए बोला.

“जो मन करे वो करो.. मैं तो चला…”

और फ़ौरन दुखिया गाँव के प्रधान के पास जा कर बोला, “आप यकीन करेंगे उन दुष्टों ने रातों-रात सैकड़ों पेड़ काट डाले… मैं कुछ नहीं जानता उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए….किसी भी तरह से उनका पता लगाइए और उन्हें पुलिस के हवाले करिए…”

और इसके बाद दुखिया घर-घर जाकर यही बात बताने लगा और साथ में सुखिया की भी शिकायत करने लगा कि इतना कुछ हो जाने पर भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ा और वो इसके लिए कुछ भी नहीं कर रहा है.

गाँव वाले भी क्या करते उसके बात सुनते और ढांढस बंधा कर अपने-अपने काम में लग जाते.

ये सब करते-करते शाम हो गयी और दुखिया अपने घर लौट आया.

अगली सुबह वह फिर से सुखिया के पास गया और कहा, “आज मैं इस घटना की शिकायत करने कोतवाली जा रहा हूँ…क्या तुम नहीं चलोगे?”

“मैं चलना तो चाहता हूँ पर क्या हम दोपहर को नहीं चल सकते?”, सुखिया बोला.

“समझ गया… तुम टाल-मटोल कर रहे हो मैं अकेले ही चला जाता हूँ…”, और दुखिया गुस्से में वहां से निकल गया.

अगली सुबह दुखिया के दिमाग में आया कि इस घटना को लेकर गांधी चौक पर धरना दिया जाए…. और वह अपनी योजना लेकर सुखिया के घर पहंचा.

“खट-खट खट-खट”, दुखिया ने सुखिया को आवाज़ देते हुए दरवाजा खटखटाया

“बापू जंगल गए हैं!”, अंदर से आवाज़ आई.

दुखिया मन ही मन सोचने लगा कि ये सुखिया भी कितना पागल है… अब जब हमारे मतलब के पेड़ ही नहीं रहे तो वो जंगल में क्या करने गया है!

वह फ़ौरन सुखिया को बुलाने के लिए जंगल की ओर बढ़ गया.

वहां पहुँच कर उसने देखा कि सुखिया उस जगह को साफ़ कर उसमे नए पेड़ लगा रहा है.

दुखिया बोला, “ये क्या कर रहे हो? अभी बहुत से लोगों को इस घटना के बारे में पता नहीं चला है…. और तुम यहाँ नए पेड़ लगाने में समय बर्बाद कर रहे हो… क्यों कर रहे हो ऐसा?”

“क्योंकि बस शिकायत करने से पेड़ वापस नहीं आ जायेंगे!”, सुखिया बोला.

दोस्तों, कुछ बुरा होने के बाद जो काम सबसे आसान होता है वो है शिकायत करना. और शायद इसीलिए हर कोई इस आसान काम को करने में ही लगा रहता है. कुछ हद तक ऐसा करना natural भी लगता है पर problem ये है कि हम बस यही करने में अपनी पूरी energy… अपना पूरा focus लगा देते हैं…हम ये नहीं सोचते की जो समस्या पैदा हुई है उसके समाधान में हम खुद क्या कर सकते हैं…

क्या गली में कचरा फैलने पर हम खुद एक डस्टबिन लगा सकते हैं?
क्या ट्रैफिक जाम कम करने के लिए हम कार की जगह मेट्रो से जा सकते हैं?
क्या जंगल कटने पर हम पेड़ लगा सकते हैं?

 

बुधवार, 15 दिसंबर 2021

बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर से जुड़ी प्रेरक कहानिया व प्रसंग

 

#1: बाबासाहेब की ईमानदारी

यह आज़ादी के पहले की घटना है. 1943 में बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर को वाइसराय काउंसिल में शामिल किया गया और उन्हें श्रम मंत्री बना दिया गया. इसके साथ ही  लोक निर्माण विभाग (PWD) भी उन्ही के पास था. इस विभाग का बजट करोड़ों में था और ठेकेदारों में इसका ठेका लेने की होड़ लगी रहती थी.

इसी लालच में दिल्ली के एक बड़े ठेकेदार ने अपने पुत्र को बाबासाहेब के पुत्र यशवंत राव के पास भेजा और बाबासाहेब के माध्यम से ठेका दिलवाने पर अपना पार्टनर बनाने और 25-50% तक का कमीशन देने का प्रस्ताव दिया. यशवंत राव उसके झांसे में आ गए और अपने पिता को यह सन्देश देने पहुँच गए.

जैसे ही बाबासाहेब ने ये बात सुनी वो आग-बबूला हो गए. उन्होंने कहा-

“मैं यहाँ पर केवल समाज के उद्धार का ध्येय को लेकर आया हूँ। अपनी संतान को पालने नहीं आया हूँ। ऐसे लोभ-लालच मुझे मेरे ध्येय से डिगा नहीं सकते।”

और उसी रात यशवंत को भूखे पेट मुम्बई वापस भेज दिया.

Source: पुस्तक ‘युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर’

#2: बाबासाहेब और लाइब्रेरियन

डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन में बहुत से कष्ट सहे लेकिन कभी भी अपनी  शिक्षा को प्रभावित नहीं होने दिया. वह हर दिन 14 से 18 घंटे तक अध्ययन किया करते थे. शिक्षा के प्रति उनकी ललक और जी तोड़ मेहनत का ही परिणाम था कि बड़ौदा के शाहू महाराज जी ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया था.

 

लन्दन प्रवास के दौरान वे रोज एक लाइब्रेरी में जाया करते थे और घंटों पढाई किया करते थे. एक बार वे लंच टाइम में अकेले लाइब्रेरी में बैठ-बैठे  ब्रेड का एक टुकड़ा खा रहे थे कि तभी लाइब्रेरियन ने उन्हें देख लिया और उन्हें डांटने लगा कि कैफेटेरिया में जाने की बजाय वे यहाँ छिप कर खाना खा रहे हैं. लाइब्रेरियन ने उनपर फाइन लगाने और उनकी मेम्बरशिप ख़त्म करने की धमकी दी.

तब बाबासाहेब ने क्षमा मांगी और अपने और अपने समाज के संघर्ष और इंग्लैंड आने के की वजह के बारे में बताया. उन्होंने यह भी बड़ी ईमानदारी से कबूल किया कि कैफेटेरिया में जाकर लंच करने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं.

उनकी बात सुनकर लाइब्रेरियन बोला-

आज से तुम लंच आर्स में यहाँ नहीं बैठोगे तुम मेरे साथ कैफेटेरिया चोलोगे और मैं तुमसे अपना खाना शेयर करूँगा.

वह लाइब्रेरियन एक यहूदी (Jew) था और उसके इस व्यवहार के कारण बाबासाहेब के मन में यहूदियों के लिए एक विशेष स्थान बन गया.

#3: ख़याल कौन रखेगा?

यह घटना तबकी है जब डॉ. आंबेडकर जब अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे. वह रोज सुबह लाइब्रेरी खुलने से पहले ही वहां पहुँच जाते थे और सबके जाने के बाद ही वे वहां से निकलते थे. यहाँ तक कि वे कई बार लाइब्रेरी की टाइमिंग ख़त्म होने के बाद भी वहां बैठे रहने की अनुमति माँगा करते थे.

उन्हें रोज ऐसा करते देख एक दिन चपरासी ने उनसे कहा, “क्यों तुम हमेशा गंभीर रहते हो, बस पढाई ही करते रहते हो और कभी किसी दोस्त के साथ मौज-मस्ती नहीं करते.”

तब बाबा साहेब बोले-

“अगर मैं ऐसा करूँगा तो मेरे लोगों का ख़याल कौन रखेगा?”

 

#4: संस्कृत का ज्ञान

डॉ. अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति (Drafting Committee of the Constitution) का अध्यक्ष बनाया गया.

बात जब scheduled languages की लिस्ट तैयार करने की आई तो बाबासाहेब उसमे सभी भाषाओँ की जननी संस्कृत को भी स्थान देना चाहते थे. हालांकि, अधिकतर सदस्यों के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया. लेकिन इस दौरान जब एक बार संस्कृत भाषा को लेकर श्री लाल बहादुर शाश्त्री और आंबेडकर जी के बीच चर्चा हो रही थी तब लोगों ने देखा कि दोनों ही महान हस्तियाँ संस्कृत में वार्तालाप कर रही हैं.

शाश्त्री जी से संस्कृत भाषा का ज्ञान होने की उम्मीद तो की जा सकती थी पर अशिक्षित दलित परिवार में जन्में बाबासाहेब भी संस्कृत भाषा पर इतनी पकड़ रखते हैं यह किसी ने नहीं सोचा था. जल्द ही ये बात मीडिया में छा गयी और सभी आंबेडकर जी के ज्ञान का लोहा मानने लगे.

#5: No Peon, No Water / चपरासी नहीं, पानी नहीं 

बाबासाहेब महार जाति से थे जिसे अछूत माना जाता था. यही कारण था कि वे विद्यालय में बाकी छात्रों के साथ नहीं बैठ सकते थे और उन्हें कक्षा के बाहर बैठ कर पढना पड़ता था. इसके अलावा उन्हें विद्यालय का नल छूने की भी अनुमति नहीं थी, जबकि बाकि के छात्र जब चाहे तब नल चला कर पानी पी सकते थे.

उन्हें सिर्फ एक ही सूरत में पानी मिल सकता था, जब विद्यालय का चपरासी भी उपस्थित हो, यही वह नहीं होता था तो कोई और भी उन्हें नल चला कर पानी नहीं देता था. इसी स्थिति को उन्होंने बाद में अपने एक article में एक लाइन में summarize किया है-

“No peon, no water.”

आज आप क्या कर रहे हैं यही तय करेगा कि कल आप क्या करेंगे

 सूखे के कारण माधवपुर गाँव के किसान बहुत परेशान थे. धरती से पानी गायब हो चुका ,ट्यूबवेल जवाब दे चुके थे… खेती करने के लिए सभी बस इंद्र की कृपा पर निर्भर थे. 

आज आप क्या कर रहे हैं यही तय करेगा कि कल आप क्या करेंगे

सूखे के कारण माधवपुर गाँव के किसान बहुत परेशान थे. धरती से पानी गायब हो चुका ,ट्यूबवेल जवाब दे चुके थे… खेती करने के लिए सभी बस इंद्र की कृपा पर निर्भर थे.

Hindi Story on Preparing Yourself in Bad Times

पर बहुत से पूजा-पाठ और यज्ञों के बावजूद बारिश होने का नाम नहीं ले रही थी. हर रोज किसान एक जगह इकठ्ठा होते और बादलों को ताकते रहते कि कब बारिश हो और वे खेतों में लौट सकें.

आज भी सभी बारिश के इंतज़ार में बैठे हुए थे कि तभी किसी ने कहा, “अरे ये हरिया कहाँ रह गया… दो-तीन दिन से वो आ नहीं रहा… कहीं मेहनत-मजदूरी करने शहर तो नहीं चला?”

बात हंसी में टल गयी पर जब अगले दो-तीन दिन हरिया दिखाई नहीं दिया तो सभी उसके घर पहुंचे.

“बेटा, तेरे बाबूजी कहाँ हैं?”, हरिया के बेटे से किसी ने प्रश्न किया.

“पापा खेत में काम करने गए हैं!”, बेटा यह कहते हुए अन्दर की ओर भागा.

“खेत में काम करने!”, सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि हरिया ऐसा कैसे कर सकता है.

“लगता है इस गर्मी में हरिया पगला गया है!”, किसी ने चुटकी ली और सभी ठहाका लगाने लगे.

लेकिन सबके अन्दर कौतूहल था कि हरिया खेत में क्या कर रहा होगा और सभी उसे देखने के लिए चल पड़े.

उन्होंने देखा कि हरिया खेत में गड्ढा खोद रहा था.

“अरे! हरिया! ये तू क्या कर रहा है?”

“कुछ नहीं बस बारिश होने की तैयारी कर रहा हूँ.”

“जहाँ बड़े-बड़े जतन करने से बारिश नहीं हुई वहां तेरा ये गड्ढा खोदने का टोटका कहाँ काम आने वाला!”

“नहीं-नहीं मैं टोटका नहीं कर रहा मैं तो बस कोशिश कर रहा हूँ कि जब बारिश हो तो मैं हर तरफ का बहाव इस जलाशय की ओर कर इसमें ढेर सारा पानी इकठ्ठा कर सकूँ… ताकि अगली बार बारिश के बिना भी कुछ दिन काम चल जाए!”

“इस बार का ठिकाना नहीं और तू अगली बार की बात कर रहा है…महीनों बीत गए और एक बूँद नहीं टपकी है आसमान से… ये बेकार की मेहनत में समय बर्बाद मत कर… चल हमारे साथ वापस चल!”

लेकिन हरिया ने उनकी बार अनसुनी कर दी और कुछ दिनों में अपना जलाशय तैयार कर लिया.

ऐसे ही कई दिन और बीत गए पर बारिश नहीं हुई… फिर एक दिन अचानक ही रात में बादलों के घरघराहट सुनाई दी… बिजली चमकने लगी और बारिश होने लगी.

मिटटी की भीनी-भीनी खुशबु सारे इलाके में फ़ैल गयी… किसानों के चेहरे खिल उठे… सभी सोचने लगे कि बस अब उनके बुरे दिन ख़त्म हो जायेंगे… लेकिन ये क्या कुछ देर बरसने के बाद बारिश थम गयी और किसानों की ख़ुशी भी जाती रही.

अगली सुबह सब खेतों का जायजा लेने पहुंचे. मिटटी बस ऊपर से गीली भर हो पायी थी, ऐसे में खेतों की जुताई शुरू तो हो सकती थी लेकिन सींचाई के लिए और भी पानी की ज़रुरत पड़ती… किसान मायूस हो अपने घरों को लौट गए.

दूसरी तरफ हरिया भी अपने खेत पहुंचा और लाबालब भरे छोटे से जलाशय को देखकर खुश हो गया. समय गँवाए बिना उसने हल उठाया और खेत जोतना शुरू कर दिया. कुछ ही महीनों में माधवपुर के सूखाग्रस्त इलाके में बस एक ही चीज हरी-भरी दिखाई दे रही थी— हरिया का खेत.

दोस्तों, जब conditions सही न हों तो ऐसे में अधिकतर लोग बस उसके सही होने का इंतज़ार करते रहते हैं, और उसे लेकर परेशान रहते हैं. जबकि करना ये चाहिए कि खुद को उस वक़्त के लिए तैयार रखना चाहिए जब परिस्थितियां बदलेंगी जब, सूखा ख़त्म होगा…जब बारिश आएगी.

क्योंकि ये प्रकृति का नियम है… दिन के बाद रात तो रात के बाद दिन आना ही आना है… आपका बुरा वक़्त हमेशा के लिए नहीं रहने वाला… चीजें बदलती हैं…. चीजें बदलेंगी… लेकिन क्या आप उस बदलाव का फायदा उठाने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं… क्या आप job opportunities आने पर उन्हें grab करने के लिए तैयारी कर रहे हैं या बस उनके ना होने का रोना रो रहे ?

… क्या acting, singing या dancing का कोई मौका मिलने पर आप उसके लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं या बस contacts न होने की अपनी बदनसीबी जाहिर कर रहे हैं.

बस इतना समझ लीजिये कि-

आज आप क्या कर रहे हैं यही तय करेगा कि कल आप क्या करेंगे.

इसलिए अगर असफल लोगों की भीड़ का हिस्सा नहीं बल्कि मुट्ठी भर कामयाब लोगों के group का part बनना चाहते हैं तो इस आज को अपना बनाइये… उठाइये अपने औजार और तैयारी करिए लहलहाती फसल की…बारिश बस होने ही वाली है!